कहानी | चचाजान की लव मैरिज | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी – Hindi Story | ChachaJaan Ki Love Marriage | Storybox with Jamshed Qamar Siddiqui


कहानी – चचाजान की लव मैरिज 
राइटर – जमशेद क़मर सिद्दीक़ी 

 

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की दिनों में मैं जब अपने चचा के साथ रहता था तो वो अक्सर जब किसी लड़के को इश्क में उदास देखते थे तो कहते थे कि ये बालिश्त भर के लड़के जो माशूक दो बार फोन न उठाए तो गाते फिरते हैं कि ये इश्क़ नहीं आसां… इन चूज़ों को अंदाज़ा ही नहीं है कि इश्क़ के लिए आज से ज़्यादा मुफ़ीद वक्त कोई रहा ही नहीं। इधर ऑनलाइन फोटो देखा, उधर मैसज कर दिया… बातें चल रही हैं… तस्वीरें भेजी जा रही हैं… ये इमोजियां बन रही हैं… कोई काम वाम नहीं… लगे पड़े हैं फोन में रात रात भर… अबे… हमारे टाइम का सुनोगे तो सर के बल खड़े हो जाओगे… कहते थे कि हमने 3 साल… तो सिर्फ तुम्हारी चची की गली में खड़े खड़े बिता दिये.. रोज़ आते थे… खड़े हो जाते थे… पहली पर्ची तीन साल बाद फेंकी… जिस खंबे से टिक कर खड़े होते थे… वहां हमाई पीठ का निशान बन गया था। अरे ये थी आशिकी… आजकल की तरह नहीं कि चेहरा देखा… समझ आया तो राइट स्पाइप वरना लेफ्ट स्वाइप मार कर इशारा कर दिया… और दिखाओ बे…  बात ख़ैर सच भी थी… चचाजान जिन्हें पूरा अलीगढ़ अब हकीम साहब कहता है, उन्होंने जिस ज़माने में लव मैरिज की थी उस ज़माने में तो अरेंज शादियों में भी चेहरा शादी की बाद दिखाया जाता था। आदमी शादी क्या करता था समझ लीजिए स्क्रैच कार्ड लेता था कि देखिए क्या निकलता है। लेकिन साहब… इश्क़ कब झुकाए झुका है… चचा जान ने एक बार अपने ज़माने का एक किस्सा बताया था… चलिए आपको सुनाते हैं …  (बाकी की कहानी स्क्रॉल करके नीचे पढ़ें, या फिर बिल्कुल नीचे दिये लिंक पर क्लिक करके इसी कहानी को ऑडियो में सुनें) 

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(बाकी की कहानी यहां से पढें) कहने लगे कि भैय्ये किस्सा उस दौर का सुना रिया हूं जब मैं कोई 30-35 के आसापस रहा हूंगा। उन दिनों नई नई फिलम आई थी जीत… धरमेंद्र का लड़के ने… बहुत ज़बरदस्त काम किया था। ऐसे सर पर कपड़ा बांधे जब हाथ फैलाकर पांचों उंगलियां खोल के चिल्लाता था….. ऐ… तो सिनेमाहॉल में हमाए जैसे अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के लड़कों को झुरझुरी चढ़ने लगी थी… जोश आ जाता था.. दिल करता था कि अभी जाएं और जाकर उस बेवफ़ा के दरवाज़े पर दहाड़ दें। अच्छा कुछ लोग तो जोश में आकर चले भी गए… वापस आए तो मरहम-पट्टियां बंधी थी। ख़ैर… हम समझदार आदमी थे… हम बहुत संभाल कप चलते थे… हर चाल सोची समझी… क्योंकि हम लूडो के माहिर थे… लूडो ने हमें यही सिखाया था कि ज़िंदगी में पासा तो किस्मत से आता है… लेकिन जो भी किस्मत से हाथ आता है… उसे कैसे चलाना है ये आप को खुद तय करना होता है। लूडो में हमाए साथी थे रमज़ानी… जिनका पीसीओ था… यूनिवर्सिटी गेट नंबर तीन पर… हम तो पूरे दिन वहीं बैठे रहते थे। रमज़ानी से दोस्ती ही लूडो की वजह से हो गयी थी… पर रमज़ानी भाई पश्चिमी यूपी के बहुत सारे लोगों की तरह लूडो को लोडू बोलते थे। लोडू खेलोगे… हम कहते… अमा… लोडू नहीं लूडो… कहते अमा वहीं।  

तो पूरा पूरा दिन हम और रमज़ानी उनके पीसीओ में बैठे खेला करते… ये आवन जावन रही है लोग बैठे हैं… बातें चल रही हैं… चाय पे चाय चली आ रही है। सब कुछ बढ़िया था… अच्छा उस ज़माने में सबके पास फोन तो होते नहीं थे… इसलिए बहुत सारे अड़ोस पड़ोस के ऐसे फोन भी आते थे कि भई… फलां को बुला दीजिए..  

कोई कहेगा… “हैलो रमज़ानी, जी वो इकराम मियां को बुला देंगे, हम पांच मिनट बाद फोन करेंगे” या “अरे रमज़ानी भाई सुनिये, अच्छन बोल रहे हैं, वो ज़रा ज़रीना खाला को बुला दीजिए, पंद्रह मिनट बाद फिर मिलाएंगे” दिनभर यही चलता। रमज़ानी भी शुरु शुरु शुरु में इख्लाक दिखाते हुए जाते थे और जिसके लिए कॉल होती थी उसको बुला लाते थे लेकिन बाद के दिनों में वो भी चालाक हो गए। फोन आता था कि फलां को बुला दीजिए तो कहते थे हां… हां… आप पांच मिनट बाद कीजिए… हम जा रहे हैं उनके घर…बुलाकर लाते हैं। 

और उसके बाद बुदबादाते हुए कोई गाली देकर अगले 20 मिनट के लिए फोन अलग रख देते… लो बेटा कर लो अब… लेकिन हां एक नम्बर था जो जब भी उनकी कॉलर आईडी पर चमकता, तो रमज़ानी के चेहरे पर मुस्कुराहट आए न आए… मेरी आंखों की चमक बढ़ जाती थी। वो एक ऐसा नंबर था जिस पर जब कॉल आती थी तो दूसरी तरफ से कोई खातून कहती थीं… आ… सुनिए… ऐ… स्लालेकुम… वो… हम आबिदा बोल रहे हैं…. रुकसाना की सहेली… आप ज़रा रुकसाना को बुला देंगे?

रुकसाना… यही तो वो नाम था… जिसके लिए उन दिनों हमा दिल धड़कता था। अमा सच बता रहे हैं अभी तुम लोगों को बता रहे हैं तो हमारे देखो हाथ के रोए देखो खड़े हो गए… मतलब ऐसी खूबसूरती कि मतलब जब वो छज्जे से लटक के गली में जाते सब्ज़ी वाले को आवाज़ देती थी… भिंडीवाले…. ओ भैय्या… रुको ज़रा… कसम से हमा दिल करता था दुनिया की जितनी भिंडी है सब अकेले खा जाएं… आंखें ऐसी खूबसूरत कि डूब के मर जाए आदमी… नीली एकदम… मुस्कुराती थी तो लगता था दूध सागर वाला झरना… और लहरा कर बड़े बड़े बाल गर्दन झटक के पीछे करती थी… तो तलवारें चल जाती थी भाई साब….  

रमज़ानी भाई… आप क्यों तकलीफ करते हैं… आप लोडू की अगली चाल सोचिए… हम बुला के लाते हैं रुकसाना को... और ये कह कर हम हांफते हुए जाते थे रुकसाना के घर…   

भागते हुए पहुंच जाते रुकसाना के घर… दरवाज़ा खटखटाते वो निकलती…. कौन हैं…
वो… वो … बस आपकी सहेली हैं न आबिदा… उसका कॉल है… चलिए फोन आने वाला है… कहते हुए ऐसे आगे बढ़ते जैसे उनको गोद में उठा लाएंगे। वो कहतीं… ओह… अच्छा… रुकिए आ रहे हैं… वो अंदर जाती और कुछ बाल वाल ठीक करके बाहर निकलतीं और बहुत अदा से कहतीं चलिए

आए हाय… ऐसा लगता था ज़िंदगी के सफर पर चलने को कह रही है। फिर रास्ते भर यहां वहां की बात होती… मौसम देखिए… अजीब ही हो गया… मैं कहता तो वो बोलती, “सही बात… दोपहर में तो बारिश और धूप साथ साथ थी… अल्लाह क्या हो रहा आजकल”
मैं कहता, मेरी नानी कहती थीं कि जब बारिश और धूप साथ हो तो जो दुआ मांगो कबूल होती है
अच्छा तो क्या दुआ मांगी
बस ये समझ लीजिए कि अपने लिए एक नेक बीवी मांगी… जो बस… आप… की तरह हेहेहे…

वो मेरी तरफ देखती और शर्म से मुस्कुरा देती….  

आपमें से जिन लोगों ने पीसीओ इस्तेमाल किया है उन्हें पता होगा कि एक छोटा सा कांच का बन हुआ केबिन भी होता था जिसमें आप कोई प्राइवेट बातें कर सकते हैं। पीसीओ आकर वो सीधे उसी में चली जाती और मैं और रमज़ानी उसे बाहर से कांच पर आबिदा से बात करते हुए देखते रहते। उसके चेहरे के एक्सप्रैशन मुझे आज भी याद हैं… बहुत खूबसूरत थी यार वो… हंसती थी तो हाथ से मुंह ढक लेती थी…. जब कोई शरारत की बात करती थी तो निचला वाला होंठ दांतों के बीच दबा लेती थी… और जब शर्मा जाती थी तो उसके कान लाल हो जाते थे… 

अच्छी बात ये थी कि ये हर हफ्ते हो ही जाता था। चचा कहते हैं कि हमाई ज़िंदगी जो है बहुत सही कट रही थी… लेकिन एक रोज़ कुछ ऐसा हुआ भतीजे कि ज़िंदगी जो है… ऐसी की तैसी में चली गयी। हुआ ये कि एक दिन जब रुकसाना कांच के केबिन में खड़ी, मुस्कुराकर कर आबिदा से बात कर रही थी। तो हमाए जी में जाने आय़ा कि क्यों ना चुपके से उसी टेलीफोन लाइन का दूसरा रिसीवर, जो बाहर रमज़ानी की टेबल पर होता था, वो उठा लिया जाए, और चुपचाप रुकसाना की आवाज़ सुनी जाए। रमज़ानी भाई ने भी कहा, करो करो… देखें तो ये लड़कियां बातें क्या करती हैं… क्या ये भी वैसी ही बातें करती हैं जो हम करतें हैं… इतनी बदतमीज़ लगती तो नहीं वैसे…  

बस हमने उठाया रिसीवर और लग गया झटका…. हाथ से रिसीवर छूट गया। दूसरी तरफ से आवाज़ किसी लड़के की थी। वो लोग जीने मरने की कसमें खा रहे थे। अरे तौबा… हमें काटो तो खून नहीं… यानि अब तक हम लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा था… आबिदा की हेल्प से रुकसाना को बुलाया जाता था और फिर बात वो लड़का करता था जो रुकसाना का आशिक था। दिमाग खराब हो गया। रमज़ानी भाई को भी गुस्सा आ गया वो बन गए जीत के सनी देओल… बोले…  

रुकसाना या तो तुम्हारी होगी या किसी की नहीं….  

ये अलग बात है कि रमज़ानी भाई डेढ़ पसली आदमी थे और सवा महीने पहले पथरी का ऑपरेशन हुआ था। लेकिन इश्क की आग थी… हमने कहा… जो होगा देखा जाएगा… ऐसा भी क्या है… तो दो दिलजले, एक मनचले को सबक सिखाने के तैयारी में जुट गए। पीसीओ की कॉलर आईडी से नम्बर निकाला गया और टेलीफोन डाइरेक्टरी में नम्बर ढूंढा तो नम्बर किसी पप्पू के नाम पर था।  

पप्पू… बै …. ये तो ऐसा ही निकला… कोई लौंडा सा होगा… दो थप्पड़ में भाग खड़ा होगा…रमज़ानी बोले, हम तो सोच रहे थे कि कोई बराबर का खतरनाक आदमी होगा… तब तो जंग में मज़ा आता… ये तो मच्छर जैसा लड़का निकला… ख़ैर… मिलाओ फोन इस पप्पू को…  
फोन किया गया… उधर से आवाज़ आई हैलो। एक बेहद नाज़ुक सी आवाज़, जैसे कोई कम उम्र लड़का, बिल्कुल शरीफाना अंदाज़ में बोला जी कौन। बारी-बारी से दोनों आवाज़ भारी करके उसे डराने-धमकाने लगे। उसे दोधपुर में बरुल्ला मार्केट के पास सुबह सुबह बुलाया गया… उन दिनों वहां पर एक पहलवान होटल हुआ करता था। होटल सुबह सुबह बंद रहता था और ज़रा आढ़ में था तो वहीं पर हिसाब किताब बराबर कर लेना था… और हिसाब किताब था भी क्या… हुल ही देना था चूरन जैसे लड़के को… तो बुला लिया।  

ख़ैर… इंतकाम का दिन आ गया। मैं और रमज़ानी दोनों पप्पू को ऐसा मज़ा चखाना चाहते थे कि दोबारा रुकसाना से बात करने की हिम्मत न करे। रमज़ानी तो अपने साथ हॉकी स्टिक भी लाए थे। मुझसे बोले – आने दो ज़लील को, गट्टे तोड़ दूंगा। 

तभी अचानक माहौल में एक थरथराहट सी महसूस हुई। एक भारी-भरकम मोटरसाइकल पर एक भारी भरकम सी शख्सियत हमारे करीब आकर रुकी। कद 6 फीट से उपर, काली शलवार-कमीज़, घनी मूछें, चेहरे पर काला चश्मा। देखकर लग रहा था जैसे किसी फिल्म का विलेन। हम दोनों पप्पू की जैसी तस्वीर मन में बनाई थी… ये तो उससे बिल्कुल उलट था। ये तो कोई पप्पू भाई था। दोनों की हालत पतली होने लगी। दोनों ने पहले एक दूसरे को देखा और फिर उसे देखा… फिर आसमान की तरफ देख कर कहा…. अल्लाह रहम।  

कहिए क्यों बुलाया था बाइक स्टैंड पर लगाते हुए उसने कहा तो रमज़ानी ने झट से हॉकी-स्टिक पीछे छिपा ली। मैंने कहा आ..आप.. आप पप्पू हैं? आ..आ.आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है।  

जी मैं पप्पू हूं, कहिए रुकसाना के सिलसिले में क्या कहना था आपको… जब उसने ये कहा तो हमने देखा कि उसकी कनपटी के नीचे एक कटे का निशान था, जैसे कभी गोली छू कर निकल गयी हो। हमारे पैर कांप रहे थे। रमज़ानी बोले, वो.. रुकसाना ने आपका ज़िक्र किया… तो…भई.. हमने सोचा कि आपसे मुलाकात कर लें.. क्यों? उसने पूछा। रमज़ानी बोले, अरे भई… क्यों क्या.. अब भाई उसने अपना भाई कहा है मुझे फिक्र तो होगी न… मैं भाई हूं उसका मुंहबोला, बहन जैसी है मेरी… तो फिक्र रहती है कि कौन है-क्या है, अब देखिए, आपसे मिल लिये तो हम मुतमइन हो गए कि वो, मतलब.. खुश रहेगी। बस यही.. इसीलिए.. सोचा.. कि…मतलब..
पप्पू बोला हम्म.. तो आप हैं…. क्या बताया था रमज़ानी.. हां
जी जी
उन्होंने सर हिलाया।
और आप कौन हैं, पप्पू ने मेरी तरफ इशारा किया तो मैंने कहा – मैं… मैं तो … मैं पापे लेने जा रहा था…
हां, वो सुबह की चाय में ऐसे डुबो के खाओ… बहुत मज़े के लगते हैं… मैं तो पापे लेने जा रहा था…पापे नहीं समझते आप… रस्क… रस्क…. रस्क लेने जा रहे थे… रमज़ानी भाई जाते दिखे तो इनके साथ आ गया… क्या मामला है… कौन है रुकसाना… नहीं क्या कोई दिक्कत है…. मैं कोई हेल्प कर सकता हूं…  
– नहीं नहीं कुछ नहीं… पप्पू बोला आप जाइये… कोई मसला नही है।  

मैं बोल ही रहा था कि तभी रमज़ानी ने जो कम्बख्त हॉकी स्टिक पैरों के बीच छुपाई थी… छूटकर ज़मीन पर गिर गई। पहले तीनों ने एक दूसरे को देखा और फिर अचानक पप्पू ने हम दोनों की तरफ देखा… हमारे चेहरों पर बंधी घिग्गी ने एक पल में सारा सच खोल दिया। इसके बाद… इसके बाद का आलम क्या बताएं…

To be continued

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