…क्यों 14 वर्ष बीतने पर भी लंका नहीं गए श्रीराम, भरत को लेकर क्या था डर!


(राम आ चुके हैं…जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो गए हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस).  इस श्रृंखला ‘रामचरित मानस’ में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका आखिरी खंड…)


सिर और भुजाएं बहुत बार काटी गईं. फिर भी वीर रावण मरता नहीं. प्रभु तो खेल कर रहे हैं, परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेश को देखकर प्रभु को क्लेश पाते समझकर व्याकुल हैं. काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है. शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ. तब श्री रामचंद्रजी ने विभीषण की ओर देखा. जिसकी इच्छा मात्र से काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवक की प्रीति की परीक्षा ले रहे हैं. विभीषणजी ने कहा- हे सर्वज्ञ! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के पालन करने वाले! हे देवता और मुनियों को सुख देने वाले! सुनिए-इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है. हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है. विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु श्री रघुनाथजी ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिए. उस समय नाना प्रकार के अपशकुन होने लगे. बहुत से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे. जगत् के दुःख (अशुभ) को सूचित करने के लिए पक्षी बोलने लगे. आकाश में जहां-तहां केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गए. दसों दिशाओं में अत्यंत दाह होने लगा (आग लगने लगी) बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा. मंदोदरी का हृदय बहुत कांपने लगा. मूर्तियां नेत्र मार्ग से जल बहाने लगीं.

मूर्तियां रोने लगीं, आकाश से वज्रपात होने लगे, अत्यंत प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूल की वर्षा करने लगे. इस प्रकार इतने अधिक अमंगल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाश में देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे. देवताओं को भयभीत जानकर कृपालु श्री रघुनाथजी धनुष पर बाण सन्धान करने लगे. कानों तक धनुष को खींचकर श्री रघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े. वे श्री रामचंद्रजी के बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों. एक बाण ने नाभि के अमृत कुंड को सोख लिया. दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओं में लगे. बाण सिरों और भुजाओं को लेकर चले. सिरों और भुजाओं से रहित रुण्ड (धड़) पृथ्वी पर नाचने लगा. धड़ प्रचण्ड वेग से दौड़ता है, जिससे धरती धंसने लगी. तब प्रभु ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिए. मरते समय रावण बड़े घोर शब्द से गरजकर बोला- राम कहां हैं? मैं ललकारकर उनको युद्ध में मारूं! रावण के गिरते ही पृथ्वी हिल गई. समुद्र, नदियां, दिशाओं के हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे. रावण धड़ के दोनों टुकड़ों को फैलाकर भालू और वानरों के समुदाय को दबाता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा. रावण की भुजाओं और सिरों को मंदोदरी के सामने रखकर रामबाण वहां चले, जहां जगदीश्वर श्री रामजी थे. सब बाण जाकर तरकस में प्रवेश कर गए. यह देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए. रावण का तेज प्रभु के मुख में समा गया. यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए. ब्रह्माण्डभर में जय-जय की ध्वनि भर गई. प्रबल भुजदंडों वाले श्री रघुवीर की जय हो.

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देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं- कृपालु की जय हो, मुकुन्द की जय हो, जय हो! हे कृपा के कंद! हे मोक्षदाता मुकुन्द! हे (राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि) द्वंद्वों के हरने वाले! हे शरणागत को सुख देने वाले प्रभो! हे दुष्ट दल को विदीर्ण करने वाले! हे कारणों के भी परम कारण! हे सदा करुणा करने वाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो. देवता हर्ष में भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं. रणभूमि में श्री रामचंद्रजी के अंगों ने बहुत से कामदेवों की शोभा प्राप्त की. सिर पर जटाओं का मुकुट है, जिसके बीच में अत्यंत मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं. मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह सहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं. श्री रामजी अपने भुजदण्डों से बाण और धनुष फिरा रहे हैं. शरीर पर रुधिर के कण अत्यंत सुंदर लगते हैं. मानो तमाल के वृक्ष पर बहुत सी ललमुनियां चिड़ियां अपने महान सुख में मग्न हुई निश्चल बैठी हों. प्रभु श्री रामचंद्रजी ने कृपा दृष्टि की वर्षा करके देव समूह को निर्भय कर दिया. वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्द की जय हो, ऐसा पुकारने लगे. पति के सिर देखते ही मंदोदरी व्याकुल और मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ी. स्त्रियां रोती हुई दौड़ीं और उस (मंदोदरी) को उठाकर रावण के पास आईं. पति की दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं. उनके बाल खुल गए, देह की संभाल नहीं रहीं. वे अनेकों प्रकार से छाती पीटती हैं और रोती हुई रावण के प्रताप का बखान करती हैं.


वे कहती हैं- हे नाथ! तुम्हारे बल से पृथ्वी सदा कांपती रहती थी. अग्नि, चंद्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे. शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है! वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु, इनमें से किसी ने भी रण में तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया. हे स्वामी! तुमने अपने भुजबल से काल और यमराज को भी जीत लिया था. वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो. तुम्हारी प्रभुता जगत भर में प्रसिद्ध है. तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियों के बल का हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता. श्री रामचंद्रजी के विमुख होने से तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुल में कोई रोने वाला भी न रह गया. हे नाथ! विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी. लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे, किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं. राम विमुख के लिए ऐसा होना अनुचित भी नहीं है अर्थात उचित ही है. हे पति! काल के पूर्ण वश में होने से तुमने (किसी का) कहना नहीं माना और चराचर के नाथ परमात्मा को मनुष्य करके जाना. दैत्य रूपी वन को जलाने के लिए अग्निस्वरूप साक्षात श्री हरि को तुमने मनुष्य करके जाना. शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा. तुम्हारा यह शरीर जन्म से ही दूसरों से द्रोह करने में तत्पर तथा पाप समूहमय रहा! इतने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्री रामजी ने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हू.

 

 

अहह! नाथ! श्री रघुनाथजी के समान कृपा का समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान ने तुमको वह गति दी, जो योगी समाज को भी दुर्लभ है. मंदोदरी के वचन कानों में सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभी ने सुख माना. ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी (परमात्मा के तत्त्व को जानने और कहने वाले) श्रेष्ठ मुनि थे. वे सभी श्री रघुनाथजी को नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गए और अत्यंत सुखी हुए. अपने घर की सब स्त्रियों को रोती हुई देखकर विभीषणजी के मन में बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गए. उन्होंने भाई की दशा देखकर दुःख किया. तब प्रभु श्री रामजी ने छोटे भाई को आज्ञा दी कि जाकर विभीषण को धैर्य बंधाओ. लक्ष्मणजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया. तब विभीषण प्रभु के पास लौट आए. प्रभु ने उनको कृपापूर्ण दृष्टि से देखा और कहा- सब शोक त्यागकर रावण की अंत्येष्टि क्रिया करो. प्रभु की आज्ञा मानकर और हृदय में देश और काल का विचार करके विभीषणजी ने विधिपूर्वक सब क्रिया की. मंदोदरी आदि सब स्त्रियां उसे रावण को तिलांजलि देकर मन में श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का वर्णन करती हुई महल को गईं.


सब क्रिया-कर्म करने के बाद विभीषण ने आकर पुनः सिर नवाया. तब कृपा के समुद्र श्री रामजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को बुलाया. श्री रघुनाथजी ने कहा कि तुम, वानरराज सुग्रीव, अंगद, नल, नील जाम्बवान और मारुति सब नीतिनिपुण लोग मिलकर विभीषण के साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो. पिताजी के वचनों के कारण मैं नगर में नहीं आ सकता. पर अपने ही समान वानर और छोटे भाई को भेजता हूं. प्रभु के वचन सुनकर वानर तुरंत चले और उन्होंने जाकर राजतिलक की सारी व्यवस्था की. आदर के साथ विभीषण को सिंहासन पर बैठाकर राजतिलक किया और स्तुति की. सभी ने हाथ जोड़कर उनको सिर नवाए. तदनन्तर विभीषणजी सहित सब प्रभु के पास आए. तब श्री रघुवीर ने वानरों को बुला लिया और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी किया. भगवान ने अमृत के समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बल से यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषण ने राज्य पाया. इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकों में नित्य नया बना रहेगा. जो लोग मेरे सहित तुम्हारी शुभ कीर्ति को परम प्रेम के साथ गाएंगे, वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसार का पार पा जाएंगे. प्रभु के वचन कानों से सुनकर वानर समूह तृप्त नहीं होते. वे सब बार-बार सिर नवाते हैं और चरणकमलों को पकड़ते हैं. फिर प्रभु ने हनुमानजी को बुला लिया. भगवान ने कहा- तुम लंका जाओ. जानकी को सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल समाचार लेकर तुम चले आओ.

तब हनुमानजी नगर में आए. यह सुनकर राक्षस-राक्षसी उनके सत्कार के लिए दौड़े. उन्होंने बहुत प्रकार से हनुमानजी की पूजा की और फिर श्री जानकीजी को दिखला दिया. हनुमानजी ने सीताजी को दूर से ही प्रणाम किया. जानकीजी ने पहचान लिया कि यह वही श्री रघुनाथजी का दूत है और पूछा- हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेना सहित कुशल से तो हैं? हनुमानजी ने कहा- हे माता! कोसलपति श्री रामजी सब प्रकार से सकुशल हैं. उन्होंने संग्राम में दस सिर वाले रावण को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है. हनुमानजी के वचन सुनकर सीताजी के हृदय में हर्ष छा गया. श्री जानकीजी के हृदय में अत्यंत हर्ष हुआ. उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में आनंदाश्रुओं का जल छा गया. वे बार-बार कहती हैं- हे हनुमान! मैं तुझे क्या दूं? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है! हनुमानजी ने कहा- हे माता! सुनिए, मैंने आज निःसंदेह सारे जगत का राज्य पा लिया, जो मैं रण में शत्रु को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्री रामजी को देख रहा हूं. जानकीजी ने कहा- हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदय में बसें और हे हनुमान्! शेष (लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझ पर प्रसन्न रहें. हे तात! अब तुम वही उपाय करो, जिससे मैं इन नेत्रों से प्रभु के कोमल श्याम शरीर के दर्शन करूं. तब श्री रामचंद्रजी के पास जाकर हनुमानजी ने जानकीजी का कुशल समाचार सुनाया. सूर्य कुलभूषण श्री रामजी ने संदेश सुनकर युवराज अंगद और विभीषण को बुला लिया और कहा- पवनपुत्र हनुमान के साथ जाओ और जानकी को आदर के साथ ले आओ.


वे सब तुरंत ही वहां गए, जहां सीताजी थीं. सब की सब राक्षसियां नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं. विभीषणजी ने शीघ्र ही उन लोगों को समझा दिया. उन्होंने बहुत प्रकार से सीताजी को स्नान कराया, बहुत प्रकार के गहने पहनाए और फिर वे एक सुंदर पालकी सजाकर ले आए. सीताजी प्रसन्न होकर सुख के धाम प्रियतम श्री रामजी का स्मरण करके उस पर हर्ष के साथ चढ़ीं. चारों ओर हाथों में छड़ी लिए रक्षक चले. सबके मनों में परम उल्लास (उमंग) है. रीछ-वानर सब दर्शन करने के लिए आए, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े. श्री रघुवीर ने कहा- हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीता को पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माता की तरह देखें. गोसाईं श्री रामजी ने हंसकर ऐसा कहा. प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गए. आकाश से देवताओं ने बहुत से फूल बरसाए. सीताजी के असली स्वरूप को पहले अग्नि में रखा था. अब भीतर के साक्षी भगवान उनको प्रकट करना चाहते हैं. इसी कारण करुणा के भंडार श्री रामजी ने लीला से कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हे सुनकर सब राक्षसियां विषाद करने लगीं. प्रभु के वचनों को सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्म से पवित्र श्री सीताजी बोलीं- हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्म के नेगी (धर्माचरण में सहायक) बनो और तुरंत आग तैयार करो.

श्री सीताजी की विरह, विवेक, धर्म और नीति से सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजी के नेत्रों में विषाद के आंसुओं का जल भर आया. वे हाथ जोड़े खड़े रहे. वे भी प्रभु से कुछ कह नहीं सकते. फिर श्री रामजी का रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत सी लकड़ी ले आए. अग्नि को खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजी के हृदय में हर्ष हुआ. उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ. सीताजी ने लीला से कहा- यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्री रघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मन की गति जानते हैं, मेरे भी मन की गति जानकर मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाएं. प्रभु श्री रामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वंदित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यंत विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चंदन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया. प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गए. प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना. देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं. तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत में प्रसिद्ध वास्तविक श्री सीताजी का हाथ पकड़ उन्हें श्री रामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णु भगवान् को लक्ष्मी समर्पित की थीं. वे सीताजी श्री रामचंद्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं. उनकी उत्तम शोभा अत्यंत ही सुंदर है. मानो नए खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो.

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देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे. आकाश में डंके बजने लगे. किन्नर गाने लगे. विमानों पर चढ़ी अप्सराएं नाचने लगीं. श्री जानकीजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी की अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गए और सुख के सार श्री रघुनाथजी की जय बोलने लगे. तब श्री रघुनाथजी की आज्ञा पाकर इंद्र का सारथी मातलि चरणों में सिर नवाकर (रथ लेकर) चला गया. तदनन्तर सदा के स्वार्थी देवता आए. वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों. हे दीनबन्धु! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव! आपने देवताओं पर बड़ी दया की. विश्व के द्रोह में तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्ग पर चलने वाला रावण अपने ही पाप से नष्ट हो गया. आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखंड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मे, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती) और दयामय हैं. आपने ही मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन और परशुराम के शरीर धारण किए. हे नाथ! जब-जब देवताओं ने दुःख पाया, तब-तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया. यह दुष्ट मलिन हृदय, देवताओं का नित्य शत्रु, काम, लोभ और मद के परायण तथा अत्यंत क्रोधी था. ऐसे अधमों के शिरोमणि ने भी आपका परम पद पा लिया. इस बात का हमारे मन में आश्चर्य हुआ.


हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्ति को भुलाकर निरंतर भवसागर के प्रवाह (जन्म-मृत्यु के चक्र) में पड़े हैं. अब हे प्रभो! हम आपकी शरण में आ गए हैं, हमारी रक्षा कीजिए. विनती करके देवता और सिद्ध सब जहां के तहां हाथ जोड़े खड़े रहे. तब अत्यंत प्रेम से पुलकित शरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे- हे नित्य सुखधाम और (दु:खों को हरने वाले) हरि! हे धनुष-बाण धारण किए हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो. हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथी को विदीर्ण करने के लिए सिंह के समान हैं. हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणों के समुद्र और परम चतुर हैं. आपके शरीर की अनेकों कामदेवों के समान, परंतु अनुपम छवि है. सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं. आपका यश पवित्र है. आपने रावणरूपी महासर्प को गरुड़ की तरह क्रोध करके पकड़ लिया. हे प्रभो! आप सेवकों को आनंद देने वाले, शोक और भय का नाश करने वाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञान स्वरूप हैं. आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणों वाला, पृथ्वी का भार उतारने वाला और ज्ञान का समूह है. किंतु अवतार लेने पर भी आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं. हे करुणा की खान श्रीरामजी! हे रघुकुल के आभूषण! हे दूषण राक्षस को मारने वाले तथा समस्त दोषों को हरने वाले! विभिषण दीन था, उसे आपने लंका का राजा बना दिया.

हे गुण और ज्ञान के भंडार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारों से रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूं. आपके भुजदंडों का प्रताप और बल प्रचंड है. दुष्ट समूह के नाश करने में आप परम निपुण हैं. हे बिना ही कारण दीनों पर दया तथा उनका हित करने वाले और शोभा के धाम! मैं श्रीजानकीजी सहित आपको नमस्कार करता हूं. आप भवसागर से तारने वाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत दोनों से परे हैं और मन से उत्पन्न होने वाले कठिन दोषों को हरने वाले हैं. आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करने वाले हैं. (लाल) कमल के समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं. आप राजाओं में श्रेष्ठ, सुख के मंदिर, सुंदर, श्री (लक्ष्मीजी) के वल्लभ तथा मद (अहंकार), काम और झूठी ममता के नाश करने वाले हैं. आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखंड हैं, इंद्रियों के विषय नहीं हैं. सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं. यह (कोई) दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है. जैसे सूर्य और सूर्य का प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी है, वैसे ही आप भी संसार से भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं. हे व्यापक प्रभो! ए सब वानर कृतार्थ रूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं. और हे हरे! हमारे (अमर) जीवन और देव (दिव्य) शरीर को धिक्कार है, जो हम आपकी भक्ति से रहित हुए संसार में (सांसारिक विषयों में) भूले पड़े हैं. हे दीनदयालु! अब दया कीजिए और मेरी उस विभेद उत्पन्न करने वाली बुद्धि को हर लीजिए, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूं और जो दु:ख है, उसे सुख मानकर आनंद से विचरता हूं.

आप दुष्टों का खंडन करने वाले और पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं. आपके चरणकमल श्री शिव-पार्वती द्वारा सेवित हैं. हे राजाओं के महाराज! मुझे यह वरदान दीजिए कि आपके चरणकमलों में सदा मेरा कल्याणदायक (अनन्य) प्रेम हो. इस प्रकार ब्रह्माजी ने अत्यंत प्रेम-पुलकित शरीर से विनती की. शोभा के समुद्र श्रीरामजी के दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे. उसी समय दशरथजी वहां आए. पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल छा गया. छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित प्रभु ने उनकी वंदना की और तब पिता ने उनको आशीर्वाद दिया. श्रीरामजी ने कहा- हे तात! यह सब आपके पुण्यों का प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराज को जीत लिया. पुत्र के वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यंत बढ़ गई. नेत्रों में जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गई. श्री रघुनाथजी ने पहले के (जीवितकाल के) प्रेम को विचारकर, पिता की ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूप का दृढ़ ज्ञान करा दिया. दशरथजी ने भेद-भक्ति में अपना मन लगाया था, इसी से उन्होंने (कैवल्य) मोक्ष नहीं पाया. मायारहित सच्चिदानंदमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त सगुण स्वरूप की उपासना करने वाले भक्त इस प्रकार मोक्ष लेते भी नहीं. उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं. प्रभु को (इष्टबुद्धि से) बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोक को चले गए. छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीश की शोभा देखकर देवराज इंद्र मन में हर्षित होकर स्तुति करने लगे- शोभा के धाम, शरणागत को विश्राम देने वाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किए हुए, प्रबल प्रतापी भुज दंडों वाले श्रीरामचंद्रजी की जय हो!


हे खरदूषण के शत्रु और राक्षसों की सेना के मर्दन करने वाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्ट को मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गए. हे भूमि का भार हरने वाले! हे अपार श्रेष्ठ महिमावाले! आपकी जय हो. हे रावण के शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो. आपने राक्षसों को बेहाल (तहस-नहस) कर दिया. लंकापति रावण को अपने बल का बहुत घमंड था. उसने देवता और गंधर्व सभी को अपने वश में कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभी के हठपूर्वक (हाथ धोकर) पीछे पड़ गया था. वह दूसरों से द्रोह करने में तत्पर और अत्यंत दुष्ट था. उस पापी ने वैसा ही फल पाया. अब हे दीनों पर दया करने वाले! हे कमल के समान विशाल नेत्रों वाले! सुनिए. मुझे अत्यंत अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु (आप) के चरण कमलों के दर्शन करने से दु:ख समूह का देने वाला मेरा वह अभिमान जाता रहा. कोई उन निर्गुन ब्रह्म का ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त (निराकार) कहते हैं. परंतु हे रामजी! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है. श्रीजानकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मेरे हृदय में अपना घर बनाइए. हे रमानिवास! मुझे अपना दास समझिए और अपनी भक्ति दीजिए.

हे रमानिवास! हे शरणागत के भय को हरने वाले और उसे सब प्रकार का सुख देने वाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिए. हे सुख के धाम! हे अनेकों कामदेवों की छबिवाले रघुकुल के स्वामी श्रीरामचंद्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ. हे देवसमूह को आनंद देने वाले, जन्म-मृत्यु, हर्ष-विषाद, सुख-दु:ख आदि द्वंद्वों के नाश करने वाले, मनुष्य शरीरधारी, अतुलनीय बलवाले, ब्रह्मा और शिव आदि से सेवनीय, करुणा से कोमल श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूं. हे कृपालु! अब मेरी ओर कृपा करके (कृपा दृष्टि से) देखकर आज्ञा दीजिए कि मैं क्या (सेवा) करूं! इंद्र के ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीरामजी बोले- हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरों ने मार डाला है, पृथ्वी पर पड़े हैं. इन्होंने मेरे हित के लिए अपने प्राण त्याग दिए. हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो. काकभुशुण्डिजी कहते हैं- हे गरुड़! सुनिए प्रभु के ये वचन अत्यंत गहन (गूढ़) हैं. ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं. प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकी को मारकर जिला सकते हैं. यहां तो उन्होंने केवल इंद्र को बड़ाई दी है. इंद्र ने अमृत बरसाकर वानर-भालुओं को जिला दिया. सब हर्षित होकर उठे और प्रभु के पास आए. अमृत की वर्षा दोनों ही दलों पर हुई. पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं. क्योंकि राक्षस के मन तो मरते समय रामाकार हो गए थे. अत: वे मुक्त हो गए, उनके भवबंधन छूट गए. किंतु वानर और भालू तो सब देवांश (भगवान की लीला के परिकर) थे. इसलिए वे सब श्रीरघुनाथजी की इच्छा से जीवित हो गए.

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श्रीरामचंद्रजी के समान दीनों का हित करने वाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसों को मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापों के घर और कामी रावण ने भी वह गति पाई जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते. फूलों की वर्षा करके सब देवता सुंदर विमानों पर चढ़-चढ़कर चले. तब सुअवसर जानकार सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचंद्रजी के पास आए- और परम प्रेम से दोनों हाथ जोड़कर, कमल के समान नेत्रों में जल भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद् वाणी से त्रिपुरारी शिवजी विनती करने लगे – हे रघुकुल के स्वामी! सुंदर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुंदर बाण धारण किए हुए आप मेरी रक्षा कीजिए. आप महामोहरूपी मेघसमूह के (उड़ाने के) लिए प्रचंड पवन हैं, संशयरूपी वन के (भस्म करने के) लिए अग्नि हैं और देवताओं को आनंद देने वाले हैं. आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणों के धाम और परम सुंदर हैं. भ्रमरूपी अंधकार के (नाश के) लिए प्रबल प्रतापी सूर्य हैं. काम, क्रोध और मदरूपी हाथियों के (वध के) लिए सिंह के समान आप इस सेवक के मनरूपी वन में निरंतर वास कीजिए. विषयकामनाओं के समूह रूपी कमलवन के (नाश के) लिए आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मन से परे हैं. भवसागर (को मथने) के लिए आप मंदराचल पर्वत हैं. आप हमारे परम भय को दूर कीजिए और हमें दुस्तर संसार सागर से पार कीजिए. हे श्यामसुंदर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबंधु! हे शरणागत को दु:ख से छुड़ाने वाले! हे राजा रामचंद्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित निरंतर मेरे हृदय के अंदर निवास कीजिए. आप मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वीमंडल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु और भय का नाश करने वाले हैं.

हे नाथ! जब अयोध्यापुरी में आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊंगा. जब शिवजी विनती करके चले गए, तब विभीषणजी प्रभु के पास आए और चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोले- हे शार्गं धनुष के धारण करने वाले प्रभो! मेरी विनती सुनिए- आपने कुल और सेना सहित रावण का वध किया, त्रिभुवन में अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीन पर बहुत प्रकार से कृपा की. अब हे प्रभु! इस दास के घर को पवित्र कीजिए और वहां चलकर स्नान कीजिए, जिससे युद्ध की थकावट दूर हो जाए. हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति का निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरों को दीजिए. हे नाथ! मुझे सब प्रकार से अपना लीजिए और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरी को पधारिए. विभीषणजी के कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभु के दोनों विशाल नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया. श्री रामजी ने कहा- हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह सच बात है. पर भरत की दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है. तपस्वी के वेष में कृश (दुबले) शरीर से निरंतर मेरा नाम जप कर रहे हैं. हे सखा! वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी से जल्दी उन्हें देख सकूं. मैं तुमसे निहोरा (अनुरोध) करता हूं.


यदि अवधि बीत जाने पर जाता हूं तो भाई को जीता न पाऊंगा. छोटे भाई भरतजी की प्रीति का स्मरण करके प्रभु का शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है. श्री रामजी ने फिर कहा- हे विभीषण! तुम कल्पभर राज्य करना, मन में मेरा निरंतर स्मरण करते रहना. फिर तुम मेरे उस धाम को पा जाओगे, जहां सब संत जाते हैं. श्री रामचंद्रजी के वचन सुनते ही विभीषणजी ने हर्षित होकर कृपा के धाम श्री रामजी के चरण पकड़ लिए. सभी वानर-भालू हर्षित हो गए और प्रभु के चरण पकड़कर उनके निर्मल गुणों का बखान करने लगे. फिर विभीषणजी महल को गए और उन्होंने मणियों के समूहों (रत्नों) से और वस्त्रों से विमान को भर लिया. फिर उस पुष्पक विमान को लाकर प्रभु के सामने रखा. तब कृपासागर श्री रामजी ने हंसकर कहा- हे सखा विभीषण! सुनो, विमान पर चढ़कर, आकाश में जाकर वस्त्रों और गहनों को बरसा दो. तब आज्ञा सुनते ही विभीषणजी ने आकाश में जाकर सब मणियों और वस्त्रों को बरसा दिया. जिसके मन को जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है. मणियों को मुंह में लेकर वानर फिर उन्हें खाने की चीज न समझकर उगल देते हैं. यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपा के धाम श्री रामजी, सीताजी और लक्ष्मणजी सहित हंसने लगे. जिनको मुनि ध्यान में भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति-नेति कहते हैं, वे ही कृपा के समुद्र श्री रामजी वानरों के साथ अनेकों प्रकार के विनोद कर रहे हैं.

अनेकों प्रकार के योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करने पर भी श्री रामचंद्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होने पर करते हैं. भालुओं और वानरों ने कपड़े-गहने पाए और उन्हें पहन-पहनकर वे श्री रघुनाथजी के पास आए. अनेकों जातियों के वानरों को देखकर कोसलपति श्री रामजी बार-बार हंस रहे हैं. श्री रघुनाथजी ने कृपा दृष्टि से देखकर सब पर दया की. फिर वे कोमल वचन बोले- हे भाइयो! तुम्हारे ही बल से मैंने रावण को मारा और फिर विभीषण का राजतिलक किया. अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ. मेरा स्मरण करते रहना और किसी से डरना नहीं. ये वचन सुनते ही सब वानर प्रेम में विह्वल होकर हाथ जोड़कर आदरपूर्वक बोले- प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है. पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है. हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकों के ईश्वर हैं. हम वानरों को दीन जानकर ही आपने सनाथ (कृतार्थ) किया है. प्रभु के (ऐसे) वचन सुनकर हम लाज के मारे मरे जा रहे हैं. कहीं मच्छर भी गरुड़ का हित कर सकते हैं? श्री रामजी का रुख देखकर रीछ-वानर प्रेम में मग्न हो गए. उनकी घर जाने की इच्छा नहीं है. परन्तु प्रभु की प्रेरणा (आज्ञा) से सब वानर-भालू श्री रामजी के रूप को हृदय में रखकर और अनेकों प्रकार से विनती करके हर्ष और विषाद सहित घर को चले.

 

 

वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा विभीषण सहित और जो बलवान वानर सेनापति हैं, वे कुछ कह नहीं सकते, प्रेमवश नेत्रों में जल भर-भरकर, नेत्रों का पलक मारना छोड़कर (टकटकी लगाए) सम्मुख होकर श्री रामजी की ओर देख रहे हैं. श्री रघुनाथजी ने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमान पर चढ़ा लिया. तदनन्तर मन ही मन विप्रचरणों में सिर नवाकर उत्तर दिशा की ओर विमान चलाया. विमान के चलते समय बड़ा शोर हो रहा है. सब कोई श्री रघुवीर की जय कह रहे हैं. विमान में एक अत्यंत ऊंचा मनोहर सिंहासन है. उस पर सीताजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी विराजमान हो गए. पत्नी सहित श्री रामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो. सुंदर विमान बड़ी शीघ्रता से चला. देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलों की वर्षा की. अत्यंत सुख देने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंधित) वायु चलने लगी. समुद्र, तालाब और नदियों का जल निर्मल हो गया. चारों ओर सुंदर शकुन होने लगे. सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएं निर्मल हैं. श्री रघुवीरजी ने कहा- हे सीते! रणभूमि देखो. लक्ष्मण ने यहां इंद्र को जीतने वाले मेघनाद को मारा था. हनुमान और अंगद के मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर रणभूमि में पड़े हैं.

देवताओं और मुनियों को दुःख देने वाले कुंभकर्ण और रावण दोनों भाई यहां मारे गए. मैंने यहां पुल बांधा (बंधवाया) और सुखधाम श्री शिवजी की स्थापना की. तदनन्तर कृपानिधान श्री रामजी ने सीताजी सहित श्री रामेश्वर महादेव को प्रणाम किया. वन में जहां-तहां करुणा सागर श्री रामचंद्रजी ने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभु ने जानकीजी को दिखलाए और सबके नाम बतलाए. विमान शीघ्र ही वहां चला आया, जहां परम सुंदर दण्डकवन था और अगस्त्य आदि बहुत से मुनिराज रहते थे. श्री रामजी इन सबके स्थानों में गए. संपूर्ण ऋषियों से आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्री रामजी चित्रकूट आए. वहां मुनियों को संतुष्ट किया. फिर विमान वहां से आगे तेजी के साथ चला. फिर श्री रामजी ने जानकीजी को कलियुग के पापों का हरण करने वाली सुहावनी यमुनाजी के दर्शन कराए. फिर पवित्र गंगाजी के दर्शन किए. श्री रामजी ने कहा- हे सीते! इन्हें प्रणाम करो. फिर तीर्थराज प्रयाग को देखो, जिसके दर्शन से ही करोड़ों जन्मों के पाप भाग जाते हैं. फिर परम पवित्र त्रिवेणीजी के दर्शन करो, जो शोकों को हरने वाली और श्री हरि के परम धाम पहुंचने के लिए सीढ़ी के समान है. फिर अत्यंत पवित्र अयोध्यापुरी के दर्शन करो, जो तीनों प्रकार के तापों और भव (आवागमन रूपी) रोग का नाश करने वाली है.


यों कहकर कृपालु श्री रामजी ने सीताजी सहित अवधपुरी को प्रणाम किया. सजल नेत्र और पुलकित शरीर होकर श्री रामजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं. फिर त्रिवेणी में आकर प्रभु ने हर्षित होकर स्नान किया और वानरों सहित ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिए. तदनन्तर प्रभु ने हनुमानजी को समझाकर कहा- तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी को जाओ. भरत को हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार लेकर चले आना. पवनपुत्र हनुमानजी तुरंत ही चल दिए. तब प्रभु भरद्वाजजी के पास गए. मुनि ने इष्ट बुद्धि से उनकी अनेकों प्रकार से पूजा की और स्तुति की और फिर लीला की दृष्टि से आशीर्वाद दिया. दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनि के चरणों की वंदना करके प्रभु विमान पर चढ़कर फिर आगे चले. यहां जब निषादराज ने सुना कि प्रभु आ गए, तब उसने ‘नाव कहां है? नाव कहां है?’ पुकारते हुए लोगों को बुलाया. इतने में ही विमान गंगाजी को लांघकर इस पार आ गया और प्रभु की आज्ञा पाकर वह किनारे पर उतरा. तब सीताजी बहुत प्रकार से गंगाजी की पूजा करके फिर उनके चरणों पर गिरीं. गंगाजी ने मन में हर्षित होकर आशीर्वाद दिया- हे सुंदरी! तुम्हारा सुहाग अखंड हो. भगवान् के तट पर उतरने की बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेम में विह्वल होकर दौड़ा. परम सुख से परिपूर्ण होकर वह प्रभु के समीप आया.

और श्री जानकीजी सहित प्रभु को देखकर वह आनंद-समाधि में मग्न होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे शरीर की सुधि न रही. श्री रघुनाथजी ने उसका परम प्रेम देखकर उसे उठाकर हर्ष के साथ हृदय से लगा लिया. सुजानों के राजा (शिरोमणि), लक्ष्मीकांत, कृपानिधान भगवान ने उसको हृदय से लगा लिया और अत्यंत निकट बैठकर कुशल पूछी. वह विनती करने लगा- आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शंकरजी से सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूं. हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्री रामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूं, नमस्कार करता हूं, सब प्रकार से नीच उस निषाद को भगवान् ने भरतजी की भांति हृदय से लगा लिया. तुलसीदासजी कहते हैं- इस मंदबुद्धि ने मैंने मोहवश उस प्रभु को भुला दिया. रावण के शत्रु का यह पवित्र करने वाला चरित्र सदा ही श्री रामजी के चरणों में प्रीति उत्पन्न करने वाला है. यह कामादि विकारों को हरने वाला और भगवान के स्वरूप का विशेष ज्ञान उत्पन्न करने वाला है. देवता, सिद्ध और मुनि आनंदित होकर इसे गाते हैं. जो सुजान लोग श्री रघुवीर की समर विजय संबंधी लीला को सुनते हैं, उनको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति ऐश्वर्य देते हैं. अरे मन! विचार करके देख! यह कलिकाल पापों का घर है. इसमें श्री रघुनाथजी के नाम को छोड़कर पापों से बचने के लिए दूसरा कोई आधार नहीं है.

कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाली श्री रामचरित मानस की यह प्रस्तुति यहां समाप्त हुई.

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