चंपई सोरेन की ताजपोशी न केवल सोरेन फैमिली बल्कि INDIA ब्लॉक के लिए भी फेस सेविंग? 5 Points में समझिए – champai soren new cm jharkhand shibu soren hemant soren family india alliance kalpana soren ntc bikt


झारखंड में चंपई सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. चंपई सोरेन के सीएम बनने के साथ ही पिछले तीन-चार दिनों से गहरे होते चले गए सियासी अनिश्चितता के बादल छंट गए हैं तो वहीं एक नए दौर का आगाज भी हुआ है. 23 साल पुराने राज्य ने 11 सीएम देखे हैं और इनमें रघुबर दास को छोड़ दें तो कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है. चंपई सोरेन राज्य के 12वें मुख्यमंत्री बन गए हैं. चंपई से पहले सूबे के जो 11 सीएम रहे हैं, उनमें से पांच तो अकेले शिबू सोरेन की अगुवाई वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) से ही हैं. दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन खुद तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं तो वहीं हेमंत सोरेन ने दो बार सूबे की सत्ता की कमान संभाली है. यह पहला मौका है जब झारखंड में जेएमएम की सरकार है लेकिन सत्ता की बागडोर शिबू सोरेन के परिवार से बाहर के किसी नेता के हाथों में है.

हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी से पहले कयास यह लगाए जा रहे थे कि ऐसी स्थिति में जेएमएम सीएम पद के लिए उनकी पत्नी कल्पना सोरेन का नाम आगे कर सकती है. हुआ भी ऐसा ही. ईडी ने शिकंजा कसा तब हेमंत ने विधायक दल की बैठक बुला ली. बैठक में कल्पना भी मौजूद थीं. सीएम के लिए कल्पना का नाम उछला भी, चर्चा भी हुई, बगैर नाम वाले समर्थन पत्र पर विधायकों के हस्ताक्षर भी लिए गए लेकिन हेमंत के बड़े भाई दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरेन ने कल्पना के नाम पर आपत्ति जता दी. नाम शिबू सोरेन के छोटे बेटे और जेएमएम की युवा इकाई के अध्यक्ष बसंत सोरेन का नाम भी चर्चा में आया लेकिन जब सीएम का ऐला हुआ, पार्टी ने चंपई पर भरोसा जताया.

झारखंड के सीएम की कुर्सी पर चंपई की ताजपोशी को लेकर कहा जा रहा है कि यह न सिर्फ जेएमएम, बल्कि विपक्षी इंडिया गठबंधन के लिए भी फेस सेविंग है. इसके पीछे जेएमएम में टूट की आशंका से लेकर गठबंधन के अन्य दलों को जोड़े रखने और परिवारवाद के मुद्दे पर बीजेपी को मुखर होने का मौका नहीं देने की रणनीति तक, कई तर्क दिए जा रहे हैं. अब आखिर ऐसा क्यों कहा जा रहा है? हेमंत सोरेन के चंपई को सीएम बनाने वाले दांव के पीछे क्या है, आइए  पांच पॉइंट में समझते हैं.

परिवार से सीएम बनता तो इंडिया गठबंधन के लिए मुश्किल होती राह

झारखंड के गोड्डा से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद निशिकांत दुबे ने झारखंड में सियासी अनिश्चितताओं के बीच एक बयान दिया था.वैसे तो वह बयान बहुत बीजेपी के संदर्भ में था लेकिन इसके तार भविष्य की रणनीति की ओर इशारा भी कर रहे थे. निशिकांत दुबे ने कहा था कि जेएमएम के हाथ भ्रष्टाचार से सने हुए हैं और बीजेपी इनके साथ गठबंधन नहीं करेगी. उन्होंने आदिवासी पॉलिटिक्स की पिच पर हेमंत के विक्टिम कार्ड वाली बैटिंग पर भी निशाना साधा और कहा कि क्या बाबूलाल मरांडी आदिवासी नहीं हैं? निशिकांत दुबे के इस छोटे से बयान में बड़ा संदेश यह था कि बीजेपी की रणनीति जेएमएम को सोरेन परिवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को उठाने और यह मैसेज देने की होगी कि आदिवासी का मतलब बस दिशोम गुरु का परिवार नहीं है.

हेमंत की गिरफ्तारी के बाद अगला सीएम अगर शिबू सोरेन के परिवार से ही किसी को बनाया जाता तो इंडिया गठबंधन के लिए बीजेपी की यह रणनीति मुश्किलें बढ़ाने वाली साबित हो सकती थीं. जेएमएम और इंडिया गठबंधन, दोनों के लिए ही यह खतरा और गहरा हो जाता कि बिहार में चट इस्तीफा और पट सरकार गठन, झारखंड में बार-बार राजभवन के चक्कर लगाने पर भी सरकार गठन के लिए न्योते में देरी के साथ ही राजनीतिक द्वेष से की गई कार्रवाई करार देकर आदिवासी पॉलिटिक्स की पिच पर केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को घेरने के लिए जो व्यूह रचा जाना है. जिस व्यूह से आदिवासी अस्मिता को धार देने, सहानुभूति के वोट मिलने की जो उम्मीदें हैं, वह भ्रष्टाचार और परिवारवाद के साथ बीजेपी का ‘मरांडी तीर’ कहीं भेद ना दे. हेमंत सोरेन के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के साथ ही ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का केस भी है.

परिवार में विवाद से बचने, पार्टी पर वर्चस्व बनाए रखने की रणनीति

सीएम के लिए कल्पना के नाम पर सोरेन परिवार में फूट की आशंका थी. कल्पना के नाम पर सीता सोरेन ने आपत्ति जताई और कहा तो यह भी जा रहा है कि उन्होंने नए सीएम के लिए समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर भी नहीं किए. दूसरी तरफ, चर्चा यह भी है कि शिबू सोरेन, हेमंत के बाद अपने छोटे बेटे बसंत सोरेन को सीएम बनाना चाह रहे थे. तीन बार की विधायक सीता की अलग दावेदारी थी तो वहीं बसंत की अलग. ऐसी स्थिति में अगर कल्पना को सीएम बनाया जाता तो सोरेन परिवार में फूट पड़ने का खतरा था. अगर सीता या बसंत में से किसी को सीएम बनाया जाता तो भी कुर्सी की रेस में पीछे रह गए परिवार के सदस्य की बगावत का खतरा जस का तस रहता और पार्टी से हेमंत की पकड़ कमजोर हो जाती सो अलग. बगावत के खतरे को टालने और पार्टी पर पकड़ बनाए रखने की हेमंत की रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

परिवारवाद की पिच पर बीजेपी को मुफीद माहौल नहीं देने की सोच

सोरेन परिवार से ही सीएम बनाए जाने की स्थिति में बीजेपी को बाबूलाल मरांडी के चेहरे को आगे कर आदिवासी पॉलिटिक्स की पिच पर जेएमएम को घेरने का मौका मिल जाता. ऐसे में सोरेन परिवार की हेमंत की गिरफ्तारी से सहानुभूति पाने की कोशिशें फेल हो सकती थीं. आदिवासी सियासत के बड़े चेहरे शिबू सोरेन और उनकी पार्टी ने बीजेपी के इस संभावित दांव को फेल करने के लिए परिवार के बाहर का चेहरा दे दिया. चंपई, शिबू सोरेन के पुराने सहयोगी हैं और सोरेन परिवार के भरोसेमंद भी.   

पार्टी और गठबंधन में किसी तरह की फूट की संभावनाएं निरस्त करना

हेमंत की गिरफ्तारी से सियासी अफरा-तफरी का माहौल बन गया था. ऐसे में जेएमएम और गठबंधन को एकजुट रखना भी बड़ी चुनौती थी. कहा तो यह भी जा रहा था कि बीजेपी की नजर कांग्रेस के विधायकों पर है. हेमंत सोरेन ने परिवार से बाहर के नेता को सत्ता की बागडोर सौंपकर गठबंधन को सेफ करने की भी कोशिश की है. दरअसल, चंपई सोरेन बीजेपी की सरकार में भी मंत्री रहे हैं. एक बार पहले भी वह सीएम बनते-बनते रह गए थे. शिबू सोरेन की उम्र अधिक हो चुकी है और वह अब सियासी रूप से उतने सक्रिय नहीं रहे. ऐसे में हेमंत के जेल जाने पर पार्टी को एकजुट बनाए रखने की चुनौती भी जेएमएम के सामने थी.

किसी भी तरह के संवैधानिक संकट से बचने की कोशिश

झारखंड में इसी साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं. विधानसभा चुनाव में करीब 11 महीने का ही समय बचा है. कल्पना सोरेन विधानसभा की सदस्य नहीं हैं. अगर उनको सीएम बनाया जाता तो फिर नियमों के मुताबिक उन्हें 6 महीने के भीतर विधानसभा पहुंचना होता. हालांकि, जेएमएम विधायक के इस्तीफे से गांडेय सीट रिक्त है और इसे कल्पना को सेफ सीट से विधानसभा भेजने की रणनीति से जोड़कर ही देखा जा रहा था. चुनाव करीब हैं ऐसे में कहीं उपचुनाव नहीं हुए तो कल्पना की कुर्सी खतरे में आती ही, सरकार फिर से वैसी ही स्थिति में पहुंच जाती जैसी स्थिति अभी बनी थी. चुनावी साल में यह जेएमएम के लिए हानिकारक भी हो सकता था. चुनावी साल में किसी तरह का संवैधानिक संकट उत्पन्न न हो, जेएमएम ने इससे बचने के लिए भी कल्पना की जगह चंपई को सीएम बनाने का फैसला लिया जो सात बार के विधायक हैं.

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