…जब अपने घूंसे से रावण को बेहोश करने पर भी हनुमान जी को खुद पर आया गुस्सा!


(राम आ चुके हैं…जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो गए हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस).  इस श्रृंखला ‘रामचरित मानस’ में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका 28वां खंड…)


भयंकर युद्ध जारी है. उधर से रावण ललकार रहा है और इधर से अंगद और हनुमान. राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामी की दुहाई देकर लड़ रहे हैं. ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़े हुए आकाश से युद्ध देख रहे हैं. दोनों ओर के योद्धा रण रस में मतवाले हो रहे हैं. वानरों को श्री रामजी का बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं). एक-दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक-दूसरे को मसल-मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं. वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते हैं. पेट फाड़ते हैं, भुजाएं उखाड़ते हैं और योद्धाओं को पैर पकड़कर पृथ्वी पर पटक देते हैं.

राक्षस योद्धाओं को भालू पृथ्वी में गाड़ देते हैं और ऊपर से बहुत सी बालू डाल देते हैं. युद्ध में शत्रुओं से विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखाई पड़ते हैं मानो बहुत से क्रोधित काल हों. क्रोधित हुए काल के समान वे वानर खून बहते हुए शरीरों से शोभित हो रहे हैं. वे बलवान वीर राक्षसों की सेना के योद्धाओं को मसलते और मेघ की तरह गरजते हैं. डांटकर चपेटों से मारते, दांतों से काटकर लातों से पीस डालते हैं. वानर-भालू चिग्घाड़ते और ऐसा छल-बल करते हैं, जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जाएं. वे राक्षसों के गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अंतड़ियां निकालकर गले में डाल लेते हैं. वे वानर ऐसे दिख पड़ते हैं मानो प्रह्लाद के स्वामी श्री नरसिंह भगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्ध के मैदान में क्रीड़ा कर रहे हों. पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वी में भर (छा) गए हैं. श्री रामचंद्रजी की जय हो, जो सचमुच तृण से वज्र और वज्र से तृण कर देते हैं (निर्बल को सबल और सबल को निर्बल कर देते हैं). अपनी सेना को विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रावण रथ पर चढ़कर गर्व करके ‘लौटो, लौटो’ कहता हुआ चला. रावण अत्यंत क्रोधित होकर दौड़ा. वानर हुंकार करते हुए (लड़ने के लिए) उसके सामने चले. उन्होंने हाथों में वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावण पर एक ही साथ डाले. पर्वत उसके वज्रतुल्य शरीर में लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं. अत्यंत क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, अपने स्थान से जरा भी नहीं हिला.

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उसे बहुत ही क्रोध हुआ. वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओं को मसलने लगा. अनेकों वानर-भालू ‘हे अंगद! हे हनुमान्! रक्षा करो, रक्षा करो’ पुकारते हुए भाग चले. हे रघुवीर! हे गोसाईं! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए. यह दुष्ट काल की भांति हमें खा रहा है. उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे, तब (रावण ने) दसों धनुषों पर बाण संधान किए. उसने धनुष पर सन्धान करके बाणों के समूह छोड़े. वे बाण सर्प की तरह उड़कर जा लगते थे. पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं. वानर भागें तो कहां? अत्यंत कोलाहल मच गया. वानर-भालुओं की सेना व्याकुल होकर आर्त्त पुकार करने लगी- हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे पीड़ितों के बन्धु! हे सेवकों की रक्षा करके उनके दुःख हरने वाले हरि! अपनी सेना को व्याकुल देखकर कमर में तरकस कसकर और हाथ में धनुष लेकर श्री रघुनाथजी के चरणों पर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले. लक्ष्मणजी ने पास जाकर कहा- अरे दुष्ट! वानर भालुओं को क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूं. रावण ने कहा- अरे मेरे पुत्र के घातक! मैं तुझी को ढूंढ रहा था. आज तुझे मारकर (अपनी) छाती ठंडी करूंगा. ऐसा कहकर उसने प्रचण्ड बाण छोड़े. लक्ष्मणजी ने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले. रावण ने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाए. लक्ष्मणजी ने उनको तिल के बराबर करके काटकर हटा दिया.


फिर अपने बाणों से उस पर प्रहार किया और उसके रथ को तोड़कर सारथी को मार डाला. रावण के दसों मस्तकों में सौ-सौ बाण मारे. वे सिरों में ऐसे पैठ गए मानो पहाड़ के शिखरों में सर्प प्रवेश कर रहे हों. फिर सौ बाण उसकी छाती में मारे. वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा. फिर मूर्च्छा छूटने पर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलाई जो ब्रह्माजी ने उसे दी थी. वह ब्रह्मा की दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजी की ठीक छाती में लगी. वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े. तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बल की महिमा यों ही रह गई, व्यर्थ हो गई, वह उन्हें उठा न सका. जिनके एक ही सिर पर ब्रह्मांड रूपी भवन धूल के एक कण के समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है! वह तीनों भुवनों के स्वामी लक्ष्मणजी को नहीं जानता. यह देखकर पवनपुत्र हनुमानजी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े. हनुमानजी के आते ही रावण ने उन पर अत्यंत भयंकर घूंसे का प्रहार किया. हनुमानजी घुटने टेककर रह गए, पृथ्वी पर गिरे नहीं और फिर क्रोध से भरे हुए संभलकर उठे. हनुमानजी ने रावण को एक घूंसा मारा. वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो. मूर्च्छा भंग होने पर फिर वह जागा और हनुमानजी के बड़े भारी बल को सराहने लगा. हनुमानजी ने कहा- मेरे पौरुष को धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है, जो हे देवद्रोही! तू अब भी जीता रह गया.

 

 

ऐसा कहकर और लक्ष्मणजी को उठाकर हनुमानजी श्री रघुनाथजी के पास ले आए. यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ. श्री रघुवीर ने लक्ष्मणजी से कहा- हे भाई! हृदय में समझो, तुम काल के भी भक्षक और देवताओं के रक्षक हो. ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे. वह कराल शक्ति आकाश को चली गई. लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रता से शत्रु के सामने आ पहुंचे. फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रता से रावण के रथ को चूर-चूर कर और सारथी को मारकर उसे रावण को व्याकुल कर दिया. सौ बाणों से उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यंत व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा. तब दूसरा सारथी उसे रथ में डालकर तुरंत ही लंका को ले गया. प्रताप के समूह श्री रघुवीर के भाई लक्ष्मणजी ने फिर आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया. वहां लंका में रावण मूर्च्छा से जागकर कुछ यज्ञ करने लगा. वह मूर्ख और अत्यंत अज्ञानी हठवश श्री रघुनाथजी से विरोध करके विजय चाहता है. यहां विभीषणजी ने सब खबर पाई और तुरंत जाकर श्री रघुनाथजी को कह सुनाई कि हे नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है. उसके सिद्ध होने पर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा. हे नाथ! तुरंत वानर योद्धाओं को भेजिए, जो यज्ञ का विध्वंस करें, जिससे रावण युद्ध में आवे. प्रातःकाल होते ही प्रभु ने वीर योद्धाओं को भेजा. हनुमान् और अंगद आदि सब दौड़े.

वानर खेल से ही कूदकर लंका पर जा चढ़े और निर्भय होकर रावण के महल में जा घुसे. ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरों को बहुत क्रोध हुआ. उन्होंने कहा- अरे ओ निर्लज्ज! रणभूमि से घर भाग आया और यहां आकर बगुले का सा ध्यान लगाकर बैठा है? ऐसा कहकर अंगद ने लात मारी. पर उसने इनकी ओर देखा भी नहीं, उस दुष्ट का मन स्वार्थ में अनुरक्त था. जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दांतों से पकड़कर काटने और लातों से मारने लगे. स्त्रियों को बाल पकड़कर घर से बाहर घसीट लाए, वे अत्यंत ही दीन होकर पुकारने लगीं. तब रावण काल के समान क्रोधित होकर उठा और वानरों को पैर पकड़कर पटकने लगा. इसी बीच में वानरों ने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मन में हारने लगा. यज्ञ विध्वंस करके सब चतुर वानर रघुनाथजी के पास आ गए. तब रावण जीने की आश छोड़कर क्रोधित होकर चला. चलते समय अत्यंत भयंकर अमंगल (अपशकुन) होने लगे. गीध उड़-उड़कर उसके सिरों पर बैठने लगे, किन्तु वह काल के वश था, इससे किसी भी अपशकुन को नहीं मानता था. उसने कहा- युद्ध का डंका बजाओ. निशाचरों की अपार सेना चली. उसमें बहुत से हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल हैं. वे दुष्ट प्रभु के सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगों के समूह अग्नि की ओर (जलने के लिए) दौड़ते हैं.


इधर देवताओं ने स्तुति की कि हे श्री रामजी! इसने हमको दारुण दुःख दिए हैं. अब आप इसे अधिक न खेलाइए. जानकीजी बहुत ही दुःखी हो रही हैं. देवताओं के वचन सुनकर प्रभु मुस्कुराए. फिर श्री रघुवीर ने उठकर बाण सुधारे. मस्तक पर जटाओं के जूड़े को कसकर बांधे हुए हैं, उसके बीच-बीच में पुष्प गूंथे हुए शोभित हो रहे हैं. लाल नेत्र और मेघ के समान श्याम शरीर वाले और संपूर्ण लोकों के नेत्रों को आनंद देने वाले हैं. प्रभु ने कमर में फेंटा तथा तरकस कस लिया और हाथ में कठोर शार्गं धनुष ले लिया. प्रभु ने हाथ में शार्गं धनुष लेकर कमर में बाणों की खान (अक्षय) सुंदर तरकस कस लिया. उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं और मनोहर चौड़ी छाती पर ब्राह्मण (भृगुजी) के चरण का चिह्न शोभित है. ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथ में लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओं के हाथी, कच्छप, शेषजी, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे. भगवान की शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलों की अपार वर्षा करने लगे और शोभा, शक्ति और गुणों के धाम करुणानिधान प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो ऐसा पुकारने लगे. इसी बीच में निशाचरों की अत्यंत घनी सेना कसमसाती हुई (आपस में टकराती हुई) आई. उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार उसके सामने चले जैसे प्रलयकाल के बादलों के समूह हों. बहुत से कृपाल और तलवारें चमक रही हैं. मानो दसों दिशाओं में बिजलियां चमक रही हों. हाथी, रथ और घोड़ों का कठोर चिंग्घाड़ ऐसा लगता है मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हों.

वानरों की बहुत सी पूंछें आकाश में छाई हुई हैं. वे ऐसी शोभा दे रही हैं मानो सुंदर इंद्रधनुष उदय हुए हों. धूल ऐसी उठ रही है मानो जल की धारा हो. बाण रूपी बूंदों की अपार वृष्टि हुई. दोनों ओर से योद्धा पर्वतों का प्रहार करते हैं. मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो. श्री रघुनाथजी ने क्रोध करके बाणों की झड़ी लगा दी, जिससे राक्षसों की सेना घायल हो गई. बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खा-खाकर जहां-तहां पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं. उनके शरीर से ऐसे खून बह रहा है मानो पर्वत के भारी झरनों से जल बह रहा हो. इस प्रकार डरपोकों को भय उत्पन्न करने वाली रुधिर की नदी बह चली. डरपोकों को भय उपजाने वाली अत्यंत अपवित्र रक्त की नदी बह चली. दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं. रथ रेत है और पहिए भंवर हैं. वह नदी बहुत भयावनी बह रही है. हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेकों सवारियां ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदी के जल जन्तु हैं. बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं, धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत से कछुवे हैं. वीर पृथ्वी पर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारे के वृक्ष ढह रहे हों. बहुत सी मज्जा बह रही है, वही फेन है. डरपोक जहां इसे देखकर डरते हैं, वहां उत्तम योद्धाओं के मन में सुख होता है. भूत, पिशाच और बेताल, बड़े-बड़े झोंटों वाले महान् भयंकर झोटिंग और प्रमथ (शिवगण) उस नदी में स्नान करते हैं. कौए और चील भुजाएं लेकर उड़ते हैं और एक-दूसरे से छीनकर खा जाते हैं.

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कोई कहते हैं, अरे मूर्खों! ऐसी सस्ती (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तट पर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहां-तहां अर्धजल (वे व्यक्ति जो मरने के समय आधे जल में रखे जाते हैं) पड़े हों. गीध आंतें खींच रहे हैं, मानो मछली मार नदी तट पर से चित्त लगाए हुए (ध्यानस्थ होकर) बंसी खेल रहे हों (बंसी से मछली पकड़ रहे हों). बहुत से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उन पर चढ़े चले जा रहे हैं. मानो वे नदी में नावरि (नौका क्रीड़ा) खेल रहे हों. योगिनियां खप्परों में भर-भरकर खून जमा कर रही हैं. भूत-पिशाचों की स्त्रियां आकाश में नाच रही हैं. चामुण्डाएं योद्धाओं की खोपड़ियों का करताल बजा रही हैं और नाना प्रकार से गा रही हैं. गीदड़ों के समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदों को काटते, खाते, हुआं-हुआं करते और पेट भर जाने पर एक-दूसरे को डांटते हैं. करोड़ों धड़ बिना सिर के घूम रहे हैं और सिर पृथ्वी पर पड़े जय-जय बोल रहे है. मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोल बोलते हैं और प्रचंड रुंड (धड़) बिना सिर के दौड़ते हैं. पक्षी खोपड़ियों में उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं, उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओं को ढहा रहे हैं. श्री रामचंद्रजी बल से दर्पित हुए वानर राक्षसों के झुंडों को मसले डालते हैं. श्री रामजी के बाण समूहों से मरे हुए योद्धा लड़ाई के मैदान में सो रहे हैं. रावण ने हृदय में विचारा कि राक्षसों का नाश हो गया है. मैं अकेला हूं और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिए मैं अब अपार माया रचूं.


देवताओं ने प्रभु को पैदल (बिना सवारी के युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदय में बड़ा भारी क्षोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ. (फिर क्या था) इंद्र ने तुरंत अपना रथ भेज दिया. उसका सारथी मातलि हर्ष के साथ उसे ले आया. उस दिव्य अनुपम और तेज के पुंज (तेजोमय) रथ पर कोसलपुरी के राजा श्री रामचंद्रजी हर्षित होकर चढ़े. उसमें चार चंचल, मनोहर, अजर, अमर और मन की गति के समान शीघ्र चलने वाले देवलोक के घोड़े जुते थे. श्री रघुनाथजी को रथ पर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े. वानरों की मार सही नहीं जाती. तब रावण ने माया फैलाई. एक श्री रघुवीर के ही वह माया नहीं लगी. सब वानरों ने और लक्ष्मणजी ने भी उस माया को सच मान लिया. वानरों ने राक्षसी सेना में भाई लक्ष्मणजी सहित बहुत से रामों को देखा. बहुत से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मन में मिथ्या डर से बहुत ही डर गए. लक्ष्मणजी सहित वे मानो चित्र लिखे से जहां के तहां खड़े देखने लगे. अपनी सेना को आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान हरि (दुःखों के हरने वाले श्री रामजी) ने हसकर धनुष पर बाण चढ़ाकर, पल भर में सारी माया हर ली. वानरों की सारी सेना हर्षित हो गई. फिर श्री रामजी सबकी ओर देखकर गंभीर वचन बोले- हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गए हो, इसलिए अब मेरा और रावण का द्वंद्व युद्ध देखो.

ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने ब्राह्मणों के चरणकमलों में सिर नवाया और फिर रथ चलाया. तब रावण के हृदय में क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा. उसने कहा- अरे तपस्वी! सुनो, तुमने युद्ध में जिन योद्धाओं को जीता है, मैं उनके समान नहीं हूं. मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत जानता है, लोकपाल तक जिसके कैद खाने में पड़े हैं. तुमने खर, दूषण और विराध को मारा! बेचारे बालr का व्याध की तरह वध किया. बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओं के समूह का संहार किया और कुंभकर्ण तथा मेघनाद को भी मारा. अरे राजा! यदि तुम रण से भाग न गए तो आज मैं (वह) सारा बैर निकाल लूंगा. आज मैं तुम्हें निश्चय ही काल के हवाले कर दूंगा. तुम कठिन रावण के पाले पड़े हो. रावण के दुर्वचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्री रामजी ने हंसकर यह वचन कहा- तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है. पर अब व्यर्थ बकवास न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ. व्यर्थ बकवास करके अपने सुंदर यश का नाश न करो. क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूं, सुनो! संसार में तीन प्रकार के पुरुष होते हैं- पाटल (गुलाब), आम और कटहल के समान. एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं. इसी प्रकार (पुरुषों में) एक कहते हैं पर करते नहीं, दूसरे कहते और करते भी हैं और एक तीसरे केवल करते हैं, पर वाणी से कहते नहीं. श्री रामजी के वचन सुनकर वह खूब हंसा और बोला- मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय बैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं.

दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर वज्र के समान बाण छोड़ने लगा. अनेकों आकार के बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वी में, सब जगह छा गए. श्री रघुवीर ने अग्निबाण छोड़ा, जिससे रावण के सब बाण क्षणभर में भस्म हो गए. तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी, किंतु श्री रामचंद्रजी ने उसको बाण के साथ वापस भेज दिया. वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं. रावण के बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं, जैसे दुष्ट मनुष्य के सब मनोरथ! तब उसने श्री रामजी के सारथी को सौ बाण मारे. वह श्री रामजी की जय पुकारकर पृथ्वी पर गिर पड़ा. श्री रामजी ने कृपा करके सारथी को उठाया. तब प्रभु अत्यंत क्रोध को प्राप्त हुए. युद्ध में शत्रु के विरुद्ध श्री रघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकस में बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलने को आतुर होने लगे). उनके धनुष का अत्यंत प्रचण्ड शब्द (टंकार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गए (अत्यंत भयभीत हो गए). मंदोदरी का हृदय कांप उठा, समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गए. दिशाओं के हाथी पृथ्वी को दांतों से पकड़कर चिग्घाड़ने लगे. यह कौतुक देखकर देवता हंसे. धनुष को कान तक तानकर श्री रामचंद्रजी ने भयानक बाण छोड़े. श्री रामजी के बाण समूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते हुए जा रहे हों.


बाण ऐसे चले मानो पंख वाले सर्प उड़ रहे हों. उन्होंने पहले सारथी और घोड़ों को मार डाला. फिर रथ को चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओं को गिरा दिया. तब रावण बड़े जोर से गरजा, पर भीतर से उसका बल थक गया था. तुरंत दूसरे रथ पर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र छोड़े. उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो गए, जैसे परद्रोह में लगे हुए चित्त वाले मनुष्य के होते हैं. तब रावण ने दस त्रिशूल चलाए और श्री रामजी के चारों घोड़ों को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया. घोड़ों को उठाकर श्री रघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े. रावण के सिर रूपी कमल वन में विचरण करने वाले श्री रघुवीर के बाण रूपी भ्रमरों की पंक्ति चली. श्री रामचंद्रजी ने उसके दसों सिरों में दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गए और सिरों से रक्त के पनाले बह चले. रुधिर बहते हुए ही बलवान रावण दौड़ा. प्रभु ने फिर धनुष पर बाण संधान किया. श्री रघुवीर ने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओं समेत दसों सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिए. सिर और हाथ काटते ही फिर नए हो गए. श्री रामजी ने फिर भुजाओं और सिरों को काट गिराया. इस तरह प्रभु ने बहुत बार भुजाएं और सिर काटे, परन्तु काटते ही वे तुरंत फिर नए हो गए. प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरों को काट रहे हैं, क्योंकि कोसलपति श्री रामजी बड़े कौतुकी हैं. आकाश में सिर और बाहु ऐसे छा गए हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों.

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मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाश मार्ग से दौड़ रहे हों. श्री रघुवीर के प्रचण्ड बाणों के (बार-बार) लगने से वे पृथ्वी पर गिरने नहीं पाते. एक-एक बाण से समूह के समूह सिर छिदे हुए आकाश में उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्य की किरणें क्रोध करके जहां-तहां राहुओं को पिरो रही हों. जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरों को काटते हैं, वैसे ही वैसे वे अपार होते जाते हैं. जैसे विषयों का सेवन करने से काम उन्हें भोगने की इच्छा दिन-प्रतिदिन नया-नया बढ़ता जाता है. सिरों की बाढ़ देखकर रावण को अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ. वह महान अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषों को तानकर दौड़ा. रणभूमि में रावण ने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्री रघुनाथजी के रथ को ढंक दिया. एक दंड (घड़ी) तक रथ दिखलाई न पड़ा, मानो कुहरे में सूर्य छिप गया हो. जब देवताओं ने हाहाकार किया, तब प्रभु ने क्रोध करके धनुष उठाया और शत्रु के बाणों को हटाकर उन्होंने शत्रु के सिर काटे और उनसे दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी सबको पाट दिया. काटे हुए सिर आकाश मार्ग से दौड़ते हैं और जय-जय की ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं. ‘लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहां हैं? कोसलपति रघुवीर कहा हैं?’

‘राम कहां हैं?’ यह कहकर सिरों के समूह दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले. तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्री रामजी ने हंसकर बाणों से उन सिरों को भलीभांति बेध डाला. हाथों में मुण्डों की मालाएं लेकर बहुत सी कालिकाएं झुंड की झुंड मिलकर इकट्ठी हुईं और वे रुधिर की नदी में स्नान करके चलीं. मानो संग्राम रूपी वटवृक्ष की पूजा करने जा रही हों. फिर रावण ने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी. वह विभीषण के सामने ऐसी चली जैसे काल (यमराज) का दण्ड हो. अत्यंत भयानक शक्ति को आती देख और यह विचार कर कि मेरा प्रण शरणागत के दुःख का नाश करना है, श्री रामजी ने तुरंत ही विभीषण को पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली. शक्ति लगने से उन्हें कुछ मूर्छा हो गई. प्रभु ने तो यह लीला की, पर देवताओं को व्याकुलता हुई. प्रभु को श्रम (शारीरिक कष्ट) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथ में गदा लेकर दौड़े. और बोले- अरे अभागे! मूर्ख, नीच दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभी से विरोध किया. तूने आदर सहित शिवजी को सिर चढ़ाए. इसी से एक-एक के बदले में करोड़ों पाए. उसी कारण से अरे दुष्ट! तू अब तक बचा है, (किन्तु) अब काल तेरे सिर पर नाच रहा है. अरे मूर्ख! तू राम विमुख होकर सम्पत्ति (सुख) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषण ने रावण की छाती के बीचो-बीच गदा मारी.


बीच छाती में कठोर गदा की घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वी पर गिर पड़ा. उसके दसों मुखों से रुधिर बहने लगा, वह अपने को फिर संभालकर क्रोध में भरा हुआ दौड़ा. दोनों अत्यंत बलवान योद्धा भिड़ गए और मल्लयुद्ध में एक-दूसरे के विरुद्ध होकर मारने लगे. श्री रघुवीर के बल से गर्वित विभीषण उसको (रावण जैसे जगद्विजई योद्धा को) पासंग के बराबर भी नहीं समझते. विभीषण क्या कभी रावण के सामने आंख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही काल के समान उससे भिड़ रहा है. यह श्री रघुवीर का ही प्रभाव है. विभीषण को बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमानजी पर्वत धारण किए हुए दौड़े. उन्होंने उस पर्वत से रावण के रथ, घोड़े और सारथी का संहार कर डाला और उसके सीने पर लात मारी. रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यंत कांपने लगा. विभीषण वहां गए, जहां सेवकों के रक्षक श्री रामजी थे. फिर रावण ने ललकारकर हनुमानजी को मारा. वे पूंछ फैलाकर आकाश में चले गए. रावण ने पूंछ पकड़ ली, हनुमानजी उसको साथ लिए ऊपर उड़े. फिर लौटकर महाबलवान हनुमानजी उससे भिड़ गए. दोनों समान योद्धा आकाश में लड़ते हुए एक-दूसरे को क्रोध करके मारने लगे. दोनों बहुत से छल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों. जब बुद्धि और बल से राक्षस गिराए न गिरा तब मारुति श्री हनुमानजी ने प्रभु को स्मरण किया.

श्री रघुवीर का स्मरण करके धीर हनुमानजी ने ललकारकर रावण को मारा. वे दोनों पृथ्वी पर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं, देवताओं ने दोनों की ‘जय-जय’ पुकारी. हनुमानजी पर संकट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े, किन्तु रण-मद-माते रावण ने सब योद्धाओं को अपनी प्रचण्ड भुजाओं के बल से कुचल और मसल डाला. तब श्री रघुवीर के ललकारने पर प्रचण्ड वीर वानर दौड़े. वानरों के प्रबल दल को देखकर रावण ने माया प्रकट की. क्षणभर के लिए वह अदृश्य हो गया. फिर उस दुष्ट ने अनेकों रूप प्रकट किए. श्री रघुनाथजी की सेना में जितने रीछ-वानर थे, उतने ही रावण जहां-तहां (चारों ओर) प्रकट हो गए. वानरों ने अपरिमित रावण देखे. भालू और वानर सब जहां-तहां (इधर-उधर) भाग चले. वानर धीरज नहीं धरते. हे लक्ष्मणजी! हे रघुवीर! बचाइए, बचाइए, यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं. दसों दिशाओं में करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर भयानक गर्जन कर रहे हैं. सब देवता डर गए और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जय की आशा छोड़ दो! एक ही रावण ने सब देवताओं को जीत लिया था, अब तो बहुत से रावण हो गए हैं. इससे अब पहाड़ की गुफाओं का आश्रय लो (अर्थात् उनमें छिप रहो). वहां ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभु की कुछ महिमा जानी थी.

जो प्रभु का प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे. वानरों ने शत्रुओं (बहुत से रावणों) को सच्चा ही मान लिया. (इससे) सब वानर-भालू विचलित होकर ‘हे कृपालु! रक्षा कीजिए’ यों पुकारते हुए भय से व्याकुल होकर भाग चले. अत्यंत बलवान् रणबांकुरे हनुमानजी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपट रूपी भूमि से अंकुर की भांति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणों को मसलते हैं. देवताओं और वानरों को विकल देखकर कोसलपति श्री रामजी हंसे और शार्गं धनुष पर एक बाण चढ़ाकर (माया के बने हुए) सब रावणों को मार डाला. प्रभु ने क्षणभर में सब माया काट डाली. जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार की राशि फट जाती है (नष्ट हो जाती है). अब एक ही रावण को देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभु पर बहुत से पुष्प बरसाए. श्री रघुनाथजी ने भुजा उठाकर सब वानरों को लौटाया. तब वे एक-दूसरे को पुकार-पुकार कर लौट आए. प्रभु का बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े. जल्दी से कूदकर वे रणभूमि में आ गए. देवताओं को श्री रामजी की स्तुति करते देख कर रावण ने सोचा, मैं इनकी समझ में एक हो गया, परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिए मैं एक ही बहुत हूं और कहा- अरे मूर्खों! तुम तो सदा के ही मेरे मरैल (मेरी मार खाने वाले) हो. ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाश पर (देवताओं की ओर) दौड़ा. देवता हाहाकार करते हुए भागे. रावण ने कहा- दुष्टों! मेरे आगे से कहां जा सकोगे? देवताओं को व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावण का पैर पकड़कर उन्होंने उसको पृथ्वी पर गिरा दिया.


उसे पकड़कर पृथ्वी पर गिराकर लात मारकर बालिपुत्र अंगद प्रभु के पास चले गए. रावण संभलकर उठा और बड़े भंयकर कठोर शब्द से गरजने लगा. वह दर्प करके दसों धनुष चढ़ाकर उन पर बहुत से बाण संधान करके बरसाने लगा. उसने सब योद्धाओं को घायल और भय से व्याकुल कर दिया और अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा. तब श्री रघुनाथजी ने रावण के सिर, भुजाएं, बाण और धनुष काट डाले. पर वे फिर बहुत बढ़ गए, जैसे तीर्थ में किए हुए पाप बढ़ जाते हैं (कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं)! शत्रु के सिर और भुजाओं की बढ़ती देखकर रीछ-वानरों को बहुत ही क्रोध हुआ. यह मूर्ख भुजाओं के और सिरों के कटने पर भी नहीं मरता, ऐसा कहते हुए भालू और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े. बालीपुत्र अंगद, मारुति हनुमानजी, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद आदि बलवान उस पर वृक्ष और पर्वतों का प्रहार करते हैं. वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षों को पकड़कर वानरों को मारता है. कोई एक वानर नखों से शत्रु के शरीर को फाड़कर भाग जाते हैं, तो कोई उसे लातों से मारकर. तब नल और नील रावण के सिरों पर चढ़ गए और नखों से उसके ललाट को फाड़ने लगे. खून देखकर उसे हृदय में बड़ा दुःख हुआ. उसने उनको पकड़ने के लिए हाथ फैलाए, पर वे पकड़ में नहीं आते, हाथों के ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं मानो दो भौंरे कमलों के वन में विचरण कर रहे हों.

 

 

तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनों को पकड़ लिया. पृथ्वी पर पटकते समय वे उसकी भुजाओं को मरोड़कर भाग छूटे. फिर उसने क्रोध करके हाथों में दसों धनुष लिए और वानरों को बाणों से मारकर घायल कर दिया. हनुमानजी आदि सब वानरों को मूर्च्छित करके और संध्या का समय पाकर रावण हर्षित हुआ. समस्त वानर-वीरों को मूर्च्छित देखकर रणधीर जाम्बवान दौड़े. जाम्बवान के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किए रावण को ललकार-ललकार कर मारने लगे. बलवान रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़-पकड़कर वह अनेकों योद्धाओं को पृथ्वी पर पटकने लगा. जाम्बवान ने अपने दल का विध्वंस देखकर क्रोध करके रावण की छाती में लात मारी. छाती में लात का प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा. उसने बीसों हाथों में भालुओं को पकड़ रखा था. (ऐसा जान पड़ता था) मानो रात्रि के समय भौंरे कमलों में बसे हुए हों. उसे मूर्च्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जाम्बवान प्रभु के पास चले. रात्रि जानकर सारथी रावण को रथ में डालकर उसे होश में लाने का उपाय करने लगा. मूर्च्छा दूर होने पर सब रीछ-वानर प्रभु के पास आए. उधर सब राक्षसों ने बहुत ही भयभीत होकर रावण को घेर लिया.

उसी रात त्रिजटा ने सीताजी के पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनाई. शत्रु के सिर और भुजाओं की बढ़ती का संवाद सुनकर सीताजी के हृदय में बड़ा भय हुआ. उनका मुख उदास हो गया, मन में चिंता उत्पन्न हो गई. तब सीताजी त्रिजटा से बोलीं- हे माता! बताती क्यों नहीं? क्या होगा? संपूर्ण विश्व को दुःख देने वाला यह किस प्रकार मरेगा? श्री रघुनाथजी के बाणों से सिर कटने पर भी नहीं मरता. विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे) ही कर रहा है. सच बात तो यह है कि मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान के चरणकमलों से अलग कर दिया है. जिसने कपट का झूठा स्वर्ण मृग बनाया था, वही देव अब भी मुझ पर रूठा हुआ है, जिस विधाता ने मुझसे दुःसह दुख सहन कराए और लक्ष्मण को कड़ुवे वचन कहलाए, जो श्री रघुनाथजी के विरह रूपी बड़े विषैले बाणों से तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुख में भी जो मेरे प्राणों को रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं. कृपानिधान श्री रामजी की याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं. त्रिजटा ने कहा- हे राजकुमारी! सुनो, देवताओं का शत्रु रावण हृदय में बाण लगते ही मर जाएगा. परन्तु प्रभु उसके हृदय में बाण इसलिए नहीं मारते कि इसके हृदय में जानकीजी (आप) बसती हैं.


वे यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं. अतः रावण के हृदय में बाण लगते ही सब भुवनों का नाश हो जाएगा. यह वचन सुनकर सीताजी के मन में अत्यंत हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटा ने फिर कहा- हे सुंदरी! महान संदेह का त्याग कर दो, अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा- सिरों के बार-बार काटे जाने से जब वह व्याकुल हो जाएगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जाएगा, तब सुजान (अंतर्यामी) श्री रामजी रावण के हृदय में बाण मारेंगे. ऐसा कहकर और सीताजी को बहुत प्रकार से समझाकर फिर त्रिजटा अपने घर चली गई. श्री रामचंद्रजी के स्वभाव का स्मरण करके जानकीजी को अत्यंत विरह व्यथा उत्पन्न हुई. वे रात्रि की और चंद्रमा की बहुत प्रकार से निंदा कर रही हैं और कह रही हैं- रात युग के समान बड़ी हो गई, वह बीतती ही नहीं. जानकीजी श्री रामजी के विरह में दुःखी होकर मन ही मन भारी विलाप कर रही हैं. जब विरह के मारे हृदय में दारुण दाह हो गया, तब उनका बायां नेत्र और बाहु फड़क उठे. शकुन समझकर उन्होंने मन में धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्री रघुवीर अवश्य मिलेंगे.

यहां आधी रात को रावण (मूर्च्छा से) जागा और अपने सारथी पर रुष्ट होकर कहने लगा- अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमि से अलग कर दिया. अरे अधम! अरे मंदबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! सारथी ने चरण पकड़कर रावण को बहुत प्रकार से समझाया. सबेरा होते ही वह रथ पर चढ़कर फिर दौड़ा. रावण का आना सुनकर वानरों की सेना में बड़ी खलबली मच गई. वे भारी योद्धा जहां-तहां से पर्वत और वृक्ष उखाड़कर क्रोध से दांत कटकटाकर दौड़े.

विकट और विकराल वानर-भालू हाथों में पर्वत लिए दौड़े. वे अत्यंत क्रोध करके प्रहार करते हैं. उनके मारने से राक्षस भाग चले. बलवान् वानरों ने शत्रु की सेना को विचलित करके फिर रावण को घेर लिया. चारों ओर से चपेटे मारकर और नखों से शरीर विदीर्ण कर वानरों ने उसको व्याकुल कर दिया. वानरों को बड़ा ही प्रबल देखकर रावण ने विचार किया और अंतर्धान होकर क्षणभर में उसने माया फैलाई. जब उसने पाखंड (माया) रचा, तब भयंकर जीव प्रकट हो गए. बेताल, भूत और पिशाच हाथों में धनुष-बाण लिए प्रकट हुए! योगिनियां एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में मनुष्य की खोपड़ी लिए ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरह के गीत गाने लगीं. वे ‘पक़ड़ो, मारो’ आदि घोर शब्द बोल रही हैं. चारों ओर (सब दिशाओं में) यह ध्वनि भर गई. वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं. तब वानर भागने लगे. वानर भागकर जहां भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं. वानर-भालू व्याकुल हो गए. फिर रावण बालू बरसाने लगा.


वानरों को जहां-तहां थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा. लक्ष्मणजी और सुग्रीव सहित सभी वीर अचेत हो गए. हा राम! हा रघुनाथ पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते (पछताते) हैं. इस प्रकार सब का बल तोड़कर रावण ने फिर दूसरी माया रची. उसने बहुत से हनुमान् प्रकट किए, जो पत्थर लिए दौड़े. उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्री रामचंद्रजी को जा घेरा. वे पूंछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, ‘मारो, पकड़ो, जाने न पावे’. उनके लंगूर (पूंछ) दसों दिशाओं में शोभा दे रहे हैं और उनके बीच में कोसलराज श्री रामजी हैं. उनके बीच में कोसलराज का सुंदर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊंचे तमाल वृक्ष के लिए अनेक इंद्रधनुषों की श्रेष्ठ बाढ़ (घेरा) बनाई गई हो. प्रभु को देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदय से ‘जय, जय, जय’ ऐसा बोलने लगे. तब श्री रघुवीर ने क्रोध करके एक ही बाण में निमेषमात्र में रावण की सारी माया हर ली. माया दूर हो जाने पर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पड़े. श्री रामजी ने बाणों के समूह छोड़े, जिनसे रावण के हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वी पर गिर पड़े. श्री रामजी और रावण के युद्ध का चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते.

सिर और भुजाएं बहुत बार काटी गईं. फिर भी वीर रावण मरता नहीं. प्रभु तो खेल कर रहे हैं, परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेश को देखकर प्रभु को क्लेश पाते समझकर व्याकुल हैं. काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है. शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ. तब श्री रामचंद्रजी ने विभीषण की ओर देखा. जिसकी इच्छा मात्र से काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवक की प्रीति की परीक्षा ले रहे हैं. विभीषणजी ने कहा- हे सर्वज्ञ! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के पालन करने वाले! हे देवता और मुनियों को सुख देने वाले! सुनिए-इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है. हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है. विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु श्री रघुनाथजी ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिए. उस समय नाना प्रकार के अपशकुन होने लगे. बहुत से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे. जगत् के दुःख (अशुभ) को सूचित करने के लिए पक्षी बोलने लगे. आकाश में जहां-तहां केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गए. दसों दिशाओं में अत्यंत दाह होने लगा (आग लगने लगी) बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा. मंदोदरी का हृदय बहुत कांपने लगा. मूर्तियां नेत्र मार्ग से जल बहाने लगीं. (जारी है…)

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