जब हनुमान, सुग्रीव और विभीषण को प्रभु राम ने समझाया चंद्रमा के काले धब्बों का रहस्य


(राम आ चुके हैं…जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो गए हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस).  इस श्रृंखला ‘रामचरित मानस’ में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका 24वां खंड…)


रावण के दूत लंका में आए और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाए. दशमुख रावण ने हंसकर बात पूछी- अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषण का समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यंत निकट आ गई है. मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका को त्याग दिया. अभागा अब जौ का कीड़ा (घुन) बनेगा (जौ के साथ जैसे घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर वानरों के साथ वह भी मारा जाएगा), फिर भालु और वानरों की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहां चली आई है. और जिनके जीवन का रक्षक कोमल चित्त वाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात्‌) उनके और राक्षसों के बीच में यदि समुद्र न होता तो अब तक राक्षस उन्हें मारकर खा गए होते. फिर उन तपस्वियों की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा डर है. उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानों से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गए? शत्रु सेना का तेज और बल बताता क्यों नहीं? तेरा चित्त बहुत ही चकित (भौंचक्का सा) हो रहा है. दूत ने कहा-) हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए. जब आपका छोटा भाई श्री रामजी से जाकर मिला, तब उसके पहुंचते ही श्री रामजी ने उसको राजतिलक कर दिया. हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुनकर वानरों ने हमें बांधकर बहुत कष्ट दिए, यहां तक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे. श्री रामजी की शपथ दिलाने पर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा. हे नाथ! आपने श्री रामजी की सेना पूछी, सो वह तो सौ करोड़ मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती. अनेकों रंगों के भालु और वानरों की सेना है, जो भयंकर मुख वाले, विशाल शरीर वाले और भयानक हैं.

जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को मारा, उसका बल तो सब वानरों में थोड़ा है. असंख्य नामों वाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं. उनमें असंख्य हाथियों का बल है और वे बड़े ही विशाल हैं. द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान ये सभी बल की राशि हैं. ये सब वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके जैसे (एक-दो नहीं) करोड़ों हैं, उन बहुत सो को गिन ही कौन सकता है. श्री रामजी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है. वे तीनों लोकों को तृण के समान (तुच्छ) समझते हैं. हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं. हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके. सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मीजते हैं. पर श्री रघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते. हम मछलियों और सांपों सहित समुद्र को सोख लेंगे. नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतों से उसे भरकर पूर (पाट) देंगे. और रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे. सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं. सब सहज ही निडर हैं, इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हैं. सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिर पर प्रभु (सर्वेश्वर) श्री रामजी हैं. हे रावण! वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं.

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श्री रामचंद्रजी के तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धि की अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते. वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, परंतु नीति निपुण श्री रामजी ने आपके भाई से उपाय पूछा. उनके (आपके भाई के) वचन सुनकर वे (श्री रामजी) समुद्र से राह मांग रहे हैं, उनके मन में कृपा भी है. दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हंसा और बोला- जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है! स्वाभाविक ही डरपोक विभीषण के वचन को प्रमाण करके उन्होंने समुद्र से मचलना (बालहठ) ठाना है. अरे मूर्ख! झूठी बड़ाई क्या करता है? बस, मैंने शत्रु (राम) के बल और बुद्धि की थाह पा ली. जिसके विभीषण जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत में विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहां! दुष्ट रावण के वचन सुनकर दूत को क्रोध बढ़ आया. उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली. और कहा- श्री रामजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है. हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिए. रावण ने हंसकर उसे बाएं हाथ से लिया और मंत्री को बुलवाकर वह मूर्ख उसे बंचाने लगा. पत्रिका में लिखा था- अरे मूर्ख! केवल बातों से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट न कर. श्री रामजी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण जाने पर भी नहीं बचेगा या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भांति प्रभु के चरण कमलों का भ्रमर बन जा. अथवा रे दुष्ट! श्री रामजी के बाण रूपी अग्नि में परिवार सहित पतिंगा हो जा.


पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परंतु मुख से (ऊपर से) मुस्कुराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा- जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी लक्ष्मण वाग्विलास करता है (डींग हांकता है). शुक (दूत) ने कहा- हे नाथ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर इस पत्र में लिखी सब बातों को सत्य समझिए. क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिए. हे नाथ! श्री रामजी से वैर त्याग दीजिए. यद्यपि श्री रघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यंत ही कोमल है. मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदय में नहीं रखेंगे. जानकीजी श्री रघुनाथजी को दे दीजिए. हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिए. जब उस (दूत) ने जानकीजी को देने के लिए कहा, तब दुष्ट रावण ने उसको लात मारी. वह भी (विभीषण की भांति) चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहां कृपासागर श्री रघुनाथजी थे. प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्री रामजी की कृपा से अपनी गति (मुनि का स्वरूप) पाई. शिवजी कहते हैं- वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था. बार-बार श्री रामजी के चरणों की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया. इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता. तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!

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हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूं. मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश), ममता में फंसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात्‌ ऊसर में बीज बोने की भांति यह सब व्यर्थ जाता है). ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया. यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा. प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी. मगर, सांप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए. जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया. समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए. हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है. आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथों ने यही गाया है. जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है. श्री रामजी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया.  

 

 

प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है. ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं. प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊंगा और सेना पार उतर जाएगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी). तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है (अर्थात्‌ आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं. अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूं. समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री रामजी ने मुस्कुराकर कहा- हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ. समुद्र ने कहा- हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं. उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था. उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएंगे. मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल के अनुसार सहायता करूंगा. हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बंधाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए. इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिए. कृपालु और रणधीर श्री रामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया. उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया. फिर चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया. 


समुद्र के वचन सुनकर प्रभु श्री रामजी ने मंत्रियों को बुलाकर ऐसा कहा- अब विलंब किसलिए हो रहा है? सेतु तैयार करो, जिसमें सेना उतरे. जाम्बवान ने हाथ जोड़कर कहा- हे सूर्यकुल के ध्वजास्वरूप (कीर्ति को बढ़ाने वाले) श्री रामजी! सुनिए. हे नाथ! (सबसे बड़ा) सेतु तो आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसार रूपी समुद्र से पार हो जाते हैं. फिर यह छोटा सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्री हनुमानजी ने कहा- प्रभु का प्रताप भारी बड़वानल (समुद्र की आग) के समान है. इसने पहले समुद्र के जल को सोख लिया था, परन्तु आपके शत्रुओं की स्त्रियों के आंसुओं की धारा से यह फिर भर गया और उसी से खारा भी हो गया. हनुमानजी की यह अत्युक्ति (अलंकारपूर्ण युक्ति) सुनकर वानर श्री रघुनाथजी की ओर देखकर हर्षित हो गए. जाम्बवान ने नल-नील दोनों भाइयों को बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनाई (और कहा-) मन में श्री रामजी के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो, (रामप्रताप से) कुछ भी परिश्रम नहीं होगा.  

फिर वानरों के समूह को बुला लिया और कहा- आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिए. अपने हृदय में श्री रामजी के चरण-कमलों को धारण कर लीजिए और सब भालू और वानर एक खेल कीजिए. विकट वानरों के समूह (आप) दौड़ जाइए और वृक्षों तथा पर्वतों के समूहों को उखाड़ लाइए. यह सुनकर वानर और भालू हूह (हुंकार) करके और श्री रघुनाथजी के प्रताप समूह की (अथवा प्रताप के पुंज श्री रामजी की) जय पुकारते हुए चले. बहुत ऊंचे-ऊंचे पर्वतों और वृक्षों को खेल की तरह ही (उखाड़कर) उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नील को देते हैं. वे अच्छी तरह गढ़कर (सुंदर) सेतु बनाते हैं. वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की तरह ले लेते हैं. सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर कृपासिन्धु श्री रामजी हंसकर वचन बोले- यहां की भूमि परम रमणीय और उत्तम है. इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती. मैं यहां शिवजी की स्थापना करूंगा. मेरे हृदय में यह महान संकल्प है. श्री रामजी के वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियों को बुलाकर ले आए. शिवलिंग की स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया फिर भगवान बोले- शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है.  

जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता. शंकरजी से विमुख होकर जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है. जिनको शंकरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास बनना चाहते हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं. जो मनुष्य रामेश्वरजी का दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जाएंगे और जो गंगाजल लाकर इन पर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा (अर्थात् मेरे साथ एक हो जाएगा). जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्री रामेश्वरजी की सेवा करेंगे, उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाएगा. श्री रामजी के वचन सबके मन को अच्छे लगे. तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमों को लौट आए. शिवजी कहते हैं- हे पार्वती! श्री रघुनाथजी की यह रीति है कि वे शरणागत पर सदा प्रीति करते हैं. चतुर नल और नील ने सेतु बांधा. श्री रामजी की कृपा से उनका यह (उज्ज्वल) यश सर्वत्र फैल गया. जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरों को डुबा देते हैं, वे ही जहाज के समान (स्वयं तैरने वाले और दूसरों को पार ले जाने वाले) हो गए. यह न तो समुद्र की महिमा वर्णन की गई है, न पत्थरों का गुण है और न वानरों की ही कोई करामात है. 


श्री रघुवीर के प्रताप से पत्थर भी समुद्र पर तैर गए. ऐसे श्री रामजी को छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामी को जाकर भजते हैं वे (निश्चय ही) मंदबुद्धि हैं. नल-नील ने सेतु बांधकर उसे बहुत मजबूत बनाया. देखने पर वह कृपानिधान श्री रामजी के मन को (बहुत ही) अच्छा लगा. सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता. योद्धा वानरों के समुदाय गरज रहे हैं. कृपालु श्री रघुनाथजी सेतुबन्ध के तट पर चढ़कर समुद्र का विस्तार देखने लगे. करुणाकन्द (करुणा के मूल) प्रभु के दर्शन के लिए सब जलचरों के समूह प्रकट हो गए. बहुत तरह के मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजन के बहुत बड़े विशाल शरीर थे. कुछ ऐसे भी जन्तु थे, जो उनको भी खा जाएं. किसी-किसी के डर से तो वे भी डर रहे थे. वे सब (वैर-विरोध भूलकर) प्रभु के दर्शन कर रहे हैं, हटाने से भी नहीं हटते. सबके मन हर्षित हैं, सब सुखी हो गए. उनकी आड़ के कारण जल नहीं दिखाई पड़ता. वे सब भगवान् का रूप देखकर आनंद और प्रेम में मग्न हो गए. प्रभु श्री रामचंद्रजी की आज्ञा पाकर सेना चली. वानर सेना की विपुलता (अत्यधिक संख्या) को कौन कह सकता है? सेतुबन्ध पर बड़ी भीड़ हो गई, इससे कुछ वानर आकाश मार्ग से उड़ने लगे और दूसरे कितने ही जलचर जीवों पर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं.

कृपालु रघुनाथजी तथा लक्ष्मणजी दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हंसते हुए चले. श्री रघुवीर सेना सहित समुद्र के पार हो गए. वानरों और उनके सेनापतियों की भीड़ कही नहीं जा सकती. प्रभु ने समुद्र के पार डेरा डाला और सब वानरों को आज्ञा दी कि तुम जाकर सुंदर फल-मूल खाओ. यह सुनते ही रीछ-वानर जहां-तहां दौड़ पड़े. श्री रामजी के हित (सेवा) के लिए सब वृक्ष ऋतु-कुऋतु- समय की गति को छोड़कर फल उठे. वानर-भालू मीठे फल खा रहे हैं, वृक्षों को हिला रहे हैं और पर्वतों के शिखरों को लंका की ओर फेंक रहे हैं. घूमते-घूमते जहां कहीं किसी राक्षस को पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच नचाते हैं और दांतों से उसके नाक-कान काटकर, प्रभु का सुयश कहकर (अथवा कहलाकर) तब उसे जाने देते हैं. जिन राक्षसों के नाक और कान काट डाले गए, उन्होंने रावण से सब समाचार कहा. समुद्र पर सेतु का बांधा जाना कानों से सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखों से बोल उठा- वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीश को क्या सचमुच ही बांध लिया?

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फिर अपनी व्याकुलता को समझकर (ऊपर से) हंसता हुआ, भय को भुलाकर, रावण महल को गया. जब मंदोदरी ने सुना कि प्रभु श्री रामजी आ गए हैं और उन्होंने खेल में ही समुद्र को बंधवा लिया है, तब वह हाथ पकड़कर, पति को अपने महल में लाकर परम मनोहर वाणी बोली. चरणों में सिर नवाकर उसने अपना आंचल पसारा और कहा- हे प्रियतम! क्रोध त्याग कर मेरा वचन सुनिए. हे नाथ! वैर उसी के साथ करना चाहिए, जिससे बुद्धि और बल के द्वारा जीत सकें. आप में और श्री रघुनाथजी में निश्चय ही कैसा अंतर है, जैसा जुगनू और सूर्य में! जिन्होंने विष्णु रूप से अत्यन्त बलवान मधु और कैटभ (दैत्य) मारे और (वराह और नृसिंह रूप से) महान शूरवीर दिति के पुत्रों (हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) का संहार किया, जिन्होंने (वामन रूप से) बलि को बांधा और (परशुराम रूप से) सहस्रबाहु को मारा, वे ही (भगवान) पृथ्वी का भार हरण करने के लिए रामरूप में अवतीर्ण हुए हैं! हे नाथ! उनका विरोध न कीजिए, जिनके हाथ में काल, कर्म और जीव सभी हैं. 

श्री रामजी के चरण कमलों में सिर नवाकर (उनकी शरण में जाकर) उनको जानकीजी सौंप दीजिए और आप पुत्र को राज्य देकर वन में जाकर श्री रघुनाथजी का भजन कीजिए. हे नाथ! श्री रघुनाथजी तो दीनों पर दया करने वाले हैं. सम्मुख (शरण) जाने पर तो बाघ भी नहीं खाता. आपको जो कुछ करना चाहिए था, वह सब आप कर चुके. आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभी को जीत लिया. हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजा को वन में चला जाना चाहिए. हे स्वामी! वहां (वन में) आप उनका भजन कीजिए जो सृष्टि के रचने वाले, पालने वाले और संहार करने वाले हैं. हे नाथ! आप विषयों की सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागत पर प्रेम करने वाले भगवान का भजन कीजिए. जिनके लिए श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं- वही कोसलाधीश श्री रघुनाथजी आप पर दया करने आए हैं. हे प्रियतम! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यंत पवित्र और सुंदर यश तीनों लोकों में फैल जाएगा.  


ऐसा कहकर, नेत्रों में (करुणा का) जल भरकर और पति के चरण पकड़कर, कांपते हुए शरीर से मंदोदरी ने कहा- हे नाथ! श्री रघुनाथजी का भजन कीजिए, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाए. तब रावण ने मंदोदरी को उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा- हे प्रिए! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है. बता तो जगत् में मेरे समान योद्धा है कौन? वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालों को तथा काल को भी मैंने अपनी भुजाओं के बल से जीत रखा है. देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वश में हैं. फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया? मंदोदरी ने उसे बहुत तरह से समझाकर कहा किन्तु रावण ने उसकी एक भी बात न सुनी और वह फिर सभा में जाकर बैठ गया. मंदोदरी ने हृदय में ऐसा जान लिया कि काल के वश होने से पति को अभिमान हो गया है. सभा में आकर उसने मंत्रियों से पूछा कि शत्रु के साथ किस प्रकार से युद्ध करना होगा? मंत्री कहने लगे- हे राक्षसों के नाथ! हे प्रभु! सुनिए, आप बार-बार क्या पूछते हैं? कहिए तो ऐसा कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाए? भय की बात ही क्या है? मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन की सामग्री हैं.

कानों से सबके वचन सुनकर रावण का पुत्र प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा- हे प्रभु! नीति के विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिए, मन्त्रियों में बहुत ही थोड़ी बुद्धि है. ये सभी मूर्ख मन्त्री ठकुरसुहाती (मुंहदेखी) कह रहे हैं. हे नाथ! इस प्रकार की बातों से पूरा नहीं पड़ेगा. एक ही बंदर समुद्र लांघकर आया था. उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं. उस समय तुम लोगों में से किसी को भूख न थी? बंदर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? इन मन्त्रियों ने स्वामी (आप) को ऐसी सम्मति सुनाई है जो सुनने में अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुख पाना होगा. जिसने खेल-ही-खेल में समुद्र बंधा लिया और जो सेना सहित सुबेल पर्वत पर आ उतरा है. हे भाई! कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे? सब गाल फुला-फुलाकर (पागलों की तरह) वचन कह रहे हैं! हे तात! मेरे वचनों को बहुत आदर से सुनिए. मुझे मन में कायर न समझ लीजिएगा. जगत में ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड हैं, जो प्यारी (मुंह पर मीठी लगने वाली) बात ही सुनते और कहते हैं. हे प्रभु! सुनने में कठोर परन्तु परिणाम में परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं,वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं. नीति सुनिए, उसके अनुसार पहले दूत भेजिए, और फिर सीता को देकर श्रीरामजी से प्रीति (मेल) कर लीजिए. यदि वे स्त्री पाकर लौट जाएं, तब तो व्यर्थ झगड़ा न बढ़ाइए. नहीं तो हे तात! सम्मुख युद्धभूमि में उनसे हठपूर्वक मार-काट कीजिए.

हे प्रभु! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत में दोनों ही प्रकार से आपका सुयश होगा. रावण ने गुस्से में भरकर पुत्र से कहा- अरे मूर्ख! तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी? अभी से हृदय में सन्देह (भय) हो रहा है? हे पुत्र! तू तो बांस की जड़ में घमोई हुआ (तू मेरे वंश के अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ). पिता की अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घर को चला गया. हित की सलाह आपको कैसे नहीं लगती, जैसे मृत्यु के वश हुए (रोगी) को दवा नहीं लगती. संध्या का समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओं को देखता हुआ महल को चला. लंका की चोटी पर एक अत्यन्त विचित्र महल था. वहां नाच-गान का अखाड़ा जमता था. रावण उस महल में जाकर बैठ गया. किन्नर उसके गुण समूहों को गाने लगे. ताल (करताल), पखावज (मृदंग) और बीणा बज रहे हैं. नृत्य में प्रवीण अप्सराएं नाच रही हैं. वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रों के समान भोग-विलास करता रहता है. यद्यपि (श्रीरामजी-सरीखा) अत्यन्त प्रबल शत्रु सिर पर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है. यहां श्री रघुवीर सुबेल पर्वत पर सेना की बड़ी भीड़ के साथ उतरे. पर्वत का एक बहुत ऊंचा, परम रमणीय, समतल और विशेष रूप से उज्ज्वल शिखर देखकर- वहां लक्ष्मणजी ने वृक्षों के कोमल पत्ते और सुंदर फूल अपने हाथों से सजाकर बिछा दिए. उस पर सुंदर और कोमल मृग छाला बिछा दी. उसी आसन पर कृपालु श्री रामजी विराजमान थे.  

 

 

प्रभु श्री रामजी वानरराज सुग्रीव की गोद में अपना सिर रखे हैं. उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस (रखा) है. वे अपने दोनों करकमलों से बाण सुधार रहे हैं. विभीषणजी कानों से लगकर सलाह कर रहे हैं. परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान अनेकों प्रकार से प्रभु के चरण कमलों को दबा रहे हैं. लक्ष्मणजी कमर में तरकस कसे और हाथों में धनुष-बाण लिए वीरासन से प्रभु के पीछे सुशोभित हैं. इस प्रकार कृपा, रूप (सौंदर्य) और गुणों के धाम श्री रामजी विराजमान हैं. वे मनुष्य धन्य हैं, जो सदा इस ध्यान में लौ लगाए रहते हैं. पूर्व दिशा की ओर देखकर प्रभु श्री रामजी ने चंद्रमा को उदय हुआ देखा. तब वे सबसे कहने लगे- चंद्रमा को तो देखो. कैसा सिंह के समान निडर है! पूर्व दिशा रूपी पर्वत की गुफा में रहने वाला, अत्यंत प्रताप, तेज और बल की राशि यह चंद्रमा रूपी सिंह अंधकार रूपी मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण करके आकाश रूपी वन में निर्भय विचर रहा है. आकाश में बिखरे हुए तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रि रूपी सुंदर स्त्री के श्रृंगार हैं. प्रभु ने कहा- भाइयो! चंद्रमा में जो कालापन है, वह क्या है? अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहो. सुग्रीव ने कहा- हे रघुनाथजी! सुनिए! चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है. किसी ने कहा- चंद्रमा को राहु ने मारा था. वहीं चोट का काला दाग हृदय पर पड़ा हुआ है.

कोई कहता है- जब ब्रह्मा ने (कामदेव की स्त्री) रति का मुख बनाया, तब उसने चंद्रमा का सारा भाग निकाल लिया (जिससे रति का मुख तो परम सुंदर बन गया, परन्तु चंद्रमा के हृदय में छेद हो गया). वही छेद चंद्रमा के हृदय में वर्तमान है, जिसकी राह से आकाश की काली छाया उसमें दिखाई पड़ती है. प्रभु श्री रामजी ने कहा- विष चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है, इसी से उसने विष को अपने हृदय में स्थान दे रखा है. विषयुक्त अपने किरण समूह को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है. हनुमानजी ने कहा- हे प्रभो! सुनिए, चंद्रमा आपका प्रिय दास है. आपकी सुंदर श्याम मूर्ति चंद्रमा के हृदय में बसती है, वही श्यामता की झलक चंद्रमा में है. पवनपुत्र हनुमानजी के वचन सुनकर सुजान श्री रामजी हंसे. फिर दक्षिण की ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले- हे विभीषण! दक्षिण दिशा की ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है. भयानक बादल मीठे-मीठे (हल्के-हल्के) स्वर से गरज रहा है. कहीं कठोर ओलों की वर्षा न हो! विभीषण बोले- हे कृपालु! सुनिए, यह न तो बिजली है, न बादलों की घटा. लंका की चोटी पर एक महल है. दशग्रीव रावण वहां नाच-गान का अखाड़ा देख रहा है.  


रावण ने सिर पर मेघडंबर (बादलों के डंबर जैसा विशाल और काला) छत्र धारण कर रखा है. वही मानो बादलों की काली घटा है. मंदोदरी के कानों में जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो! वही मानो बिजली चमक रही है. हे देवताओं के सम्राट! सुनिए, अनुपम ताल मृदंग बज रहे हैं. वही मधुर (गर्जन) ध्वनि है. रावण का अभिमान समझकर प्रभु मुस्कुराए. उन्होंने धनुष चढ़ाकर उस पर बाण का सन्धान किया. और एक ही बाण से (रावण के) छत्र-मुकुट और (मंदोदरी के) कर्णफूल काट गिराए. सबके देखते-देखते वे जमीन पर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसी ने नहीं जाना. ऐसा चमत्कार करके श्री रामजी का बाण वापस आकर फिर तरकस में जा घुसा. यह महान रस भंग (रंग में भंग) देखकर रावण की सारी सभा भयभीत हो गई. न भूकम्प हुआ, न बहुत जोर की हवा (आंधी) चली. न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रों से देखे. (फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल जैसे कटकर गिर पड़े?) सभी अपने-अपने हृदय में सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ! सभा को भयतीत देखकर रावण ने हंसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे- सिरों का गिरना भी जिसके लिए निरंतर शुभ होता रहा है, उसके लिए मुकुट का गिरना अपशकुन कैसा? अपने-अपने घर जाकर सो रहो (डरने की कोई बात नहीं है) तब सब लोग सिर नवाकर घर गए. जब से कर्णफूल पृथ्वी पर गिरा, तब से मंदोदरी के हृदय में सोच बस गया. नेत्रों में जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह रावण से कहने लगी- हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिए. हे प्रियतम! श्री राम से विरोध छोड़ दीजिए. उन्हें मनुष्य जानकर मन में हठ न पकड़े रहिए.  

मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिए कि ये रघुकुल के शिरोमणि श्री रामचंद्रजी विश्व रूप हैं- यह सारा विश्व उन्हीं का रूप है. वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं. पाताल (जिन विश्व रूप भगवान का) चरण है, ब्रह्म लोक सिर है, अन्य (बीच के सब) लोकों का विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अंगों पर है. भयंकर काल जिनका भृकुटि संचालन (भौंहों का चलना) है. सूर्य नेत्र हैं, बादलों का समूह बाल है, अश्विनी कुमार जिनकी नासिका हैं, रात और दिन जिनके अपार निमेष (पलक मारना और खोलना) हैं. दसों दिशाएं कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं. वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणी है, लोभ जिनका अधर (होठ) है, यमराज भयानक दांत हैं. माया हंसी है, दिक्पाल भुजाएं हैं. अग्नि मुख है, वरुण जीभ है. उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा (क्रिया) है, अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियां जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियां हैं, नदियां नसों का जाल है, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचे की इंद्रियां हैं. इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना (ऊहापोह) क्या की जाए? शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चंद्रमा मन हैं और महान (विष्णु) ही चित्त हैं. उन्हीं चराचर रूप भगवान श्री रामजी ने मनुष्य रूप में निवास किया है. हे प्राणपति सुनिए, ऐसा विचार कर प्रभु से वैर छोड़कर श्री रघुवीर के चरणों में प्रेम कीजिए, जिससे मेरा सुहाग न जाए. (जारी है…)

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