राममंदिर की कहानीः आस्था…आक्रमण…आक्रोश…आंदोलन और उत्थान का अयोध्या कांड!



सरयू नदी के पवित्र तटों के बीच स्थित है अयोध्या. अयोध्या नगर यानी कि हजार किस्से-कहानियों का शहर. राजा दशरथ, राम-लक्ष्मण, माता सीता, हनुमान और डरावने राक्षस. अयोध्या का जिक्र होते ही मन के चलचित्र पर रामायण काल के पात्र सजीव हो उठते हैं.  

यूं तो अयोध्या का मतलब तलाशें तो अर्थ निकलता है जिसे शत्रु न जीत सके. लेकिन इतिहास हमें बताता है कि इस नगर को लेकर कई बार लड़ाइयां हुईं, साजिशें हुईं.

आदि कवि वाल्मीकि और तुलसीदास बताते हैं कि अयोध्या की इसी पावन भूमि पर रामलला का जन्म हुआ था. उनकी लीलाएं,  चमत्कार और अवतार के भावपूर्ण किस्से कौन नहीं जानता.

ये तो हुई धर्मग्रंथों की बात. लेकिन हमारे ग्रैंडफादर, ग्रेट ग्रैंडफादर और ग्रेट-ग्रेट ग्रैंडफादर के दौर में अयोध्या की क्या कहानी थी. राजा राम के बाद अयोध्या का क्या हुआ? ऐसे सवाल मन में जरूर आते होंगे… यहां से आता है स्टोरी में ट्विस्ट.  

आज की अयोध्या की कहानी जानने के लिए फ्लैशबैक में चलना होगा. घड़ी की सुइयों को 500 साल पीछे घुमा लीजिए. 


बात 1500 ईस्वी की है. वो जमाना जब हमारे परदादा के परदादा के परदादा इस धरती पर आबाद रहे होंगे. वो धरती जो भारतवर्ष प्राचीन काल में चंद्रगुप्त, अशोक, विक्रमादित्य जैसे महान योद्धाओं और राजाओं की भूमि थी.  

मध्य काल आते आते इस भारत के हिन्दू राजा कमजोर और फूट के शिकार हो चुके थे. इसी मौके का फायदा उज्बेकिस्तान के एक लड़ाकू सरदार ने उठाया. नाम था जहीरुद्दीन मोहम्मद उर्फ बाबर.  

1526 में बाबर ने हिन्दुस्तान में मुगल सल्तनत की नींव डाली. आगरा को उसने राजधानी बनाया. 2 साल ही गुजरे थे बाबर की नजर उसी अयोध्या पर गई जहां रामजी का जन्म हुआ था.  

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बाबर ने सेनापति मीर बाकी को हिन्दुओं के इस पवित्र मंदिर को तोड़ने का फरमान दिया. 1528 में मीर बाकी ने उस मंदिर को तोड़ दिया जहां हिन्दू सदियों से राम की पूजा करते थे. इस विदेशी आक्रमणकारी ने उसी मलबे से उसी जगह पर एक मस्जिद खड़ी कर दी. नाम दिया बाबरी मस्जिद.  

हिंदुओं ने इस चोट से बहुत अपमान, दुख और गुस्सा महसूस किया. वे चाहते थे कि इस राम मंदिर को फिर से बनाया जाए. लेकिन उनकी उम्मीदें परवान चढ़ें कैसे? उनके सपनों का मंदिर हकीकत बने कैसे? 


रामनवमियां गुजर गईं, कई दीवाली आकर चली गईं, समय के प्रवाह को झेल रही अयोध्या अपनी पीड़ा सीने में दबाए विलाप करती रही. ये नगर कभी नहीं रौशन हुआ. 200-250 साल गुजर गए. हिन्दुओं ने आराध्य राम मंदिर की इच्छा को मानस की चौपाइयां, अवध के गीतों और मिथिला की लोक कथाओं में जीवित रखा.

समय ने करवट ली, एक मुकद्दर कितने दिनों तक सिकंदर रहता. 1857 आते-आते मुगलों का सूरज डूब चुका था. हिन्दुस्तान की सरजमीं पर यूरोप से आए अंग्रेजों का उदय हुआ.  

इतिहास की उबासियों से निकलकर वर्तमान में दस्तक दें तो पाते हैं कि हिन्दुओं की उम्मीदें कुलबुलाने लगीं. कहा जाता है कि 1857 में अयोध्या में डेरा डाले रहने वाले साधु-संतों, वैरागियों ने बाबरी मस्जिद के बाहरी हिस्से पर कब्जा करके चबूतरा बना लिया और भजन-पूजा शुरू कर दी. इनका मस्जिद में आने वाले नमाजियों से टकराव होने लगा.

बाबरी मस्जिद के एक कर्मचारी मौलवी मोहम्मद असगर ने 30 नवंबर 1858 को लिखित शिकायत की कि हिंदू वैरागियों ने मस्जिद से सटाकर एक चबूतरा बना लिया है और मस्जिद की दीवारों पर राम-राम लिख दिया है.

1859 में अंग्रेजों ने एक उपाय निकाला. उन्होंने झगड़े वाली जगह को दो हिस्सों में बांटा. मुसलमानों को मस्जिद के अंदर का हिस्सा दिया वहीं हिंदुओं को बाहर चबूतरे के पास पूजा करने की इजाजत मिली. लेकिन ये इंतजाम ज्यादा दिन चला नहीं.

1885 में निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवरदास ने रामलला का पहला मुकदमा अंग्रेज साहबों की कचहरी में दाखिल किया. अपनी अर्जी में उन्होंने 17 बाय 21 फीट लम्बे-चौड़े चबूतरे को जन्मस्थान बताया और वहीं पर मंदिर बनाने की अनुमति मांगी. उन्होंने दलील दी कि मंदिर जरूरी है ताकि पुजारी और भगवान दोनों धूप, सर्दी और बारिश से बच सकें.

लेकिन इस फरियाद पर कोई सुनवाई नहीं हुई. अंग्रेजों तो पहले ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच बैलेंस बनाकर अपना साम्राज्य मजबूत कर रहे थे. उन्हें कौन सा यहां इंसाफ करना था.


आखिरकार 1947 में देश स्वतंत्र हो गया. इसी के साथ ही हिन्दुओं के मन में राम लहर एक बार फिर से हिलोर मारने लगी. अयोध्या के संत वैरागी आजाद देश में रामलला का मंदिर देखना चाहते थे.  

मौका देखकर हिंदुओं ने चबूतरे पर फिर से मंदिर निर्माण करना चाहा. लेकिन फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट शफ़ी ने इस कोशिश को खारिज कर दिया. मामला ठंडा पड़ा लेकिन हिन्दुओं का टकराव जारी रहा.  

एक साल और गुजर गया. आजादी के बाद भारत सेटल हो रहा था. 1949 में भारत का  संविधान अमल में आया. नए कायदे और कानून से देश चलने लगा. इसी बीच अयोध्या में एक रात ऐसा वाकया हुआ. जिसने हिन्दू और मुसलमानों दोनों की Psyche (साइकी) में उथल-पुथल मचा दिया.

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रामलला प्रकट हुए हैं, राम आए हैं…23 दिसंबर 1949 की सुबह अयोध्या के आस-पास ये कानाफूसी आम होने लगी. कुछ ही घंटों में ये बात जंगल की आग की तरह फैल गई कि पिछली रात विवादित मस्जिद के ठीक नीचे रामलला प्रकट हुए हैं. मस्जिद के बाहर हजारों हिन्दुओं की भीड़ जमा हो गई.  

आखिर ये था क्या. जितनी मुंह उतनी बातें.कहा जाता है कि 22-23 दिसंबर की दरम्यानी रात अभय रामदास नाम के एक साधु और उनके कुछ साथियों ने मस्जिद की दीवार फांदकर भगवान राम-जानकी और लक्ष्मण की प्रतिमाएं मस्जिद के अंदर रख दीं और यह बात फैला दी कि राम जी प्रकट होकर अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो गए हैं.  


किस्सा तो यह भी है अभय रामदास की इस योजना को फैजाबाद कलेक्टर के के नायर का भी आशीर्वाद प्राप्त था. आखिर अगले दिन उन्होंने मूर्तियां क्यों नहीं हटवाई. वे तो अपने सीनियरों का गुस्सा भी झेल गए. बाद में नायर साहब ने इस मस्जिद को विवादित मानकर इस पर ताला लगवा दिया.

रिटायरमेंट के बाद नायर साहब की अफसरी चली गई तो वे जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे.

फिर आया साल 1950. इस साल दो मुकदमे दायर हुए. एक मुकदमा गोपाल सिंह विशारद का था, दूसरा था महंत रामचंद्र परमहंस का. कहा जाता है कि मस्जिद में मूर्तियां रखने वालों में हिन्दू महासभा के नगर अध्यक्ष रामचंद्र परमहंस भी थे. इन्होंने दर्शन पूजा पर रोक न लगाने और विवादित ढांचे से मूर्तियों को न हटाने की मांग की. 1951 में निर्मोही अखाड़े ने तीसरा मुकदमा दायर किया. ये तीनों केस हिन्दू पक्ष के थे.

10 साल बाद 1961 में मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी वक्फ बोर्ड और स्थानीय मुसलमानों की ओर से मुकदमा दायर किया गया. इन्होंने न केवल विवादित जगह के पजेशन की मांग की बल्कि आस-पास के कब्रिस्तानों पर भी दावा किया.  

जिला कोर्ट में इन चारों मामलों की एक साथ सुनवाई होने लगी. हिन्दू पक्ष की ओर रामचंद्र परमहंस अहम पक्षकार थे तो मुस्लिमों के पैरवीकार थे हाशिम अंसारी.  

इंसानियत के अफसाने बड़े कमाल के होते हैं. अयोध्या की गलियां इन दो विपरित आस्था वाले दोस्तों की दोस्ती की गवाह रही हैं. कभी आप गूगल करेंगे तो पाएंगे कि अपने-अपने विश्वास की रक्षा करते हुए भी इन्होंने आदमियत के रिश्ते में दरार न आने दी.

ऐसे मौके आए जब दोनों एक ही रिक्शे, एक ही तांगे में बैठकर हंसते-बतियाते पैरवी करने अदालत पहुंचते. बेतकुल्फ्फी ऐसी रहती कि दोनों साथ बैठकर ताश खेलते, चाय पीते. 


मुकदमा चलता रहा, माहौल बदलता रहा. साठ की दहाई अस्सी में आ गई. नया हिन्दुस्तान आ ही रहा था. भारत-पाकिस्तान युद्ध, इमरजेंसी, बीजेपी का गठन, संघ की सक्रियता, इंदिरा गांधी की हत्या… देश में बड़े बड़े कांड हुए. हाशिम अंसारी और बाबा परमहंस सालों साल चप्पलें चटकाते रहे तो कुछ किरदार अपनी सियासत चमकाते रहे.

1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में प्रचंड वापसी हुई, इसी साल बीजेपी बनी, तो संघ ने हिन्दुओं की गोलबंदी का प्लान बनाया. 84 आते आते इसका खाका तैयार हो चुका था. संघ की नजर हिन्दुओं के 3 आराध्य राम, कृष्ण और शिव पर गई. संयोग से इससे जुड़े तीन आराधना स्थल अयोध्या, मथुरा और काशी मुस्लिमों के साथ कलेश की वजह थे. संघ ने इन तीनों को आधार बनाकर हिन्दुओं को झकझोरने का महायज्ञ शुरू किया.  

7-8 अप्रैल 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद बुलाई गई. यहां इन तीनों स्थानों की मुक्ति का प्रस्ताव पास किया गया.  

बीजेपी नेता लालकृष्ण अडवाणी की रथ यात्रा से आप परिचित हैं, लेकिन क्या आप 1984 की रथ यात्रा भी जानते हैं. जी हां, 1984 में रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़े लोगों ने जनकपुर से एक रथ यात्रा निकाली. इस यात्रा में राम-जानकी की प्रतिमाओं को कैद में दिखाया गया. पहली बार अयोध्या की कहानी लोगों ने आंखों से देखी. इस लाचारी में देख हिन्दू समुदाय में आक्रोश पनपा. इस यात्रा ने हिन्दुओं के मन में 400 साल की दुश्वारी और लाचारी को ताजा कर दिया.  

अब तक विश्व हिन्दू परिषद पूरी ताकत के साथ आंदोलन में शामिल हो चुकी थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. इधर हिन्दुओं ने सरकार को अल्टीमेटम दिया कि अगर 1986 की शिवरात्रि तक मस्जिद का ताला न खोला गया तो वे इसे तोड़ देंगे.  


इसी वक्त कहानी में दो पांडेय किरदारों की एंट्री होती है. एक थे उमेश चंद्र पांडेय, दूसरे केएम पांडेय. पहले वाले पांडेय वकील थे और दूसरे वाले जज. कहने वाले कहते हैं कि राजीव गांधी और उनके रणनीतिकारों ने फैजाबाद कोर्ट में वकील उमेश चंद्र पांडेय से अर्जी डलवाई. मांग ये थी कि ताले को खोला जाए. जज को अर्जी में मेरिट नजर आया और उन्होंने मस्जिद का ताला खोलने की अनुमति दे दी. मस्जिद के अंदर 1949 में स्थापित रामलला विराजमान थे ही.  

राजीव की पॉलिटिक्स की किताब में ये अहम चैप्टर था. उनपर हिन्दुओं के दबाव में झुकने का आरोप लगा. लेकिन राजीव इसे झेल गए. आगे शाहबानो केस और बोफोर्स कांड से भी उनका सामना हुआ.

बीजेपी अबतक खुलकर इस आंदोलन में उतर चुकी थी. अगला चुनाव भी नजदीक आ रहा था. जून 1989 में बीजेपी ने पालमपुर में एक प्रस्ताव पास किया. पार्टी ने सरकार से मांग की कि कोर्ट इस मामले का फैसला नहीं कर सकती. सरकार समझौते से या संसद में कानून बनाकर राम जन्मस्थान हिंदुओं को सौंप दे.

मंदिर आंदोलन अब यौवन पर था. जोश तो था ही लोगों ने जज्बा भी झोंक दिया. राजीव का कार्यकाल पूरा हुआ तो देश नई सरकार चुनने जा रहा था. मस्जिद का ताला खुलवा चुके राजीव ने 1989 देश में रामराज्य लाने के नारे के साथ अयोध्या से चुनावी अभियान की शुरुआत की.  

इसी बैकग्राउंड में पहली बार अयोध्या में शिलान्यास हुआ. उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने यह कहकर शिलान्यास की अनुमति दी कि वो जगह विवादित क्षेत्र से बाहर है. आखिरकार मस्जिद से 200 फीट की दूरी पर VHP ने शिलान्यास किया लेकिन मुस्लिम समुदाय के तीखे विरोध के कारण यहां निर्माण कार्य नहीं हो सका. तब VHP के अशोक सिंघल इस मूवमेंट को लीड कर रहे थे.  


89 के चुनाव में बीजेपी इस मुद्दे को उठाती रही. आडवाणी ने चुनाव प्रचार में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिन्दू अस्मिता का सवाल उठाया और कांग्रेस की सेकुलर नीतियों पर चुभने वाले सवाल किए. बीजेपी की इस पॉलिसी का परिणाम नतीजों में दिखा. 1984 में मात्र 2 सीटों पर खाता खोलने वाली बीजेपी को इसबार बंपर 85 सीटें मिलीं.  

बीजेपी ने साबित कर दिया कि हिन्दुत्व की उपजाऊ जमीन पर वोटों की पैदावार हो सकती है. तत्काल ही आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली. वे जल्द ही अपने रथी रूप में देश के सामने आने वाले थे. 

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इस बार अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, एल के आडवाणी, प्रमोद महाजन, और बीजेपी तत्कालीन गुजरात संगठन सचिव नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं ने इस मुद्दे पर माहौल बनाने के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकालने की प्लानिंग की.  

प्रमोद महाजन ने मिनी बस को रथ के रूप में रिडिजाइन करने का आइडिया दिया. इसके बाद टोयोटा की मिनी बस को भगवा रथ का आकार दिया गया.  

25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से निकली यात्रा ने जनमानस को करंट दे दिया. आडवाणी ने यहां हाई वोल्टेज भाषण दिया और सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा लगाया.

पश्चिमी भारत से निकलकर ये रथ जब हिन्दी हार्टलैंड पहुंचा तो राम लहर की तरंगें निकल पड़ी. हिन्दू-मुस्लिम का घोर ध्रुवीकरण हुआ, दंगे हुए, जानें गईं. आडवाणी लोकप्रियता के शिखर पर थे. वो स्वयं कहते हैं- लोग रथ के पहिए को छूकर प्रणाम करते थे, पहिये के धूल को सिर पर लेप लेते थे.


इस रथ के सारथी थे नरेंद्र भाई मोदी. हैरत की बात ये थी इस रथ का चालक सलीम मक्कानी नाम का एक मुस्लिम था.  

30 अक्टूबर को इस रथ को अयोध्या पहुंचना था. लेकिन तब तक बिहार, यूपी और केंद्र की सरकारों के कान खड़े हो चुके थे. आडवाणी का रथ अविभाजित बिहार में प्रवेश कर चुका था. 7 महीने पहले बिहार के सीएम बने लालू यादव तब राजनीति के युवा थे. 42 साल के लालू यादव ने आडवाणी की रथ यात्रा पर फुल स्टाप लगाने का प्लान बनाया.  

लालू ने अपने दो अफसरों को इस मिशन पर भेजा. रात होते ही प्रशासन ने शहर का टेलीफोन एक्सचेंज डाउन करवा दिया. 22-23 अक्टूबर की दरम्यानी रात को आडवाणी रथ यात्रा को विराम देकर समस्तीपुर सर्किट हाउस में रुके थे.

सुबह पौने पांच बजे उनके दरवाजे पर दस्तक हुई और आडवाणी को बताया गया कि उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. आडवाणी ने उसी वक्त अफसरों से कागज मांगा, उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के नाम एक पत्र लिखकर केंद्र की वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया. आडवाणी गिरफ्तार कर लिए गए. भारत की सरकार गिर गई. इस गिरफ्तारी ने लालू को मुसलमानों का हीरो बना दिया. वे सेकुलर नायक बनकर उभरे.  

आडवाणी को गिरफ्तार करने गए दो अधिकारी आज देश की दो बड़ी पार्टियों के साथ हैं. पहले अफसर आरके सिंह आज बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री हैं, जबकि दूसरे अधिकारी रामेश्वर उरांव कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने और झारखंड के बड़े नेता हैं.  

इधर आडवाणी की पुकार पर तमाम पाबंदियों के बावजूद लाखों कारसेवक 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंच चुके थे. सीएम मुलायम सिंह की तैयारियां नाकाफी रहीं. यूपी में 2 लाख कारसेवक गिरफ्तार किए गए. जेलें भर गईं.


VHP ने 30 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 44 मिनट पर मंदिर निर्माण शुरू करने का ऐळान किया था. पुलिस को चकमा देने के लिए अशोक सिंघल वेश बदलकर अयोध्या पहुंचे थे.  

30 अक्टूबर को अयोध्या में घमासान हुआ. कारसेवा की गई. विवादित गुंबदों पर झंडा लगा दिया. तोड़-फोड़ हुई. अर्धसैनिक बलों को गोली चलानी पड़ी. गुबंद पर झंड़ा फहराते दो कारसेवक जान दे गए. तीन ने नींव खोदते हुए प्राण त्याग दिए. कारसेवक गर्जना कर रहे थे- रामलला हम आए हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे.

आखिरकार प्रशासन ने गोली चलवाई. गोलियां सरयू नदी के पुल पर मौजूद कारसेवकों पर भी चलीं. यहां 20 कारसेवक मारे गए. तफ्तीश इस आंकड़े को ज्यादा भी बताती है. अखबारों ने सुर्खियां लगाई- कारसेवकों के खून से लाल हो गई सरयू.  

इस सिलसिले में कोठारी बंधुओं को कौन भूल सकता है. दो नवंबर को दिगंबर अखाड़े से हनुमानगढ़ी की ओर जाते समय पुलिस ने फायरिंग की जिसमें दोनों भाइयों को गोली लगी, दोनों ने ही मौके पर ही दम तोड़ दिया.  

इस घटना से मुलायम सिंह को हिन्दुओं की तीखी आलोचना झेलनी पड़ी. उन्हें मुल्ला मुलायम कहा जाने लगा. अगले चुनाव में उनकी करारी हार हुई. बीजेपी के कल्याण सिंह यूपी के नए सीएम बने. 1991 चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या हो गई. कांग्रेस के पीवी नरसिम्हा राव देश के नए प्रधानमंत्री बने. 


मंदिर जैसे आस्था के मुद्दे पर देश में कटुता का माहौल बना रहा. दिसंबर 1992 में फिर से कार सेवा का ऐलान किया गया. सीएम कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया कि उनकी सरकार मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होने देगी. लेकिन 6 दिसंबर 1992 को वीएचपी, बजरंग दल और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को गिरा दिया और मस्जिद की एक-एक ईंट उखाड़कर मलबे पर अस्थायी मंदिर बना दिया. इस दौरान लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी आसपास ही मौजूद रहे. वहीं दूसरी ओर विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा कारसेवकों का जोश बढ़ा रही थीं.  

ये मंजर भारत के सामाजिक-राजनीतिक माहौल का अद्भुत दृश्य था. जहां शौर्य और ‘शर्म’ एक साथ दिखे. कारसेवकों ने सबसे पहले विवादित ढांचे की बाहरी और भीतरी दीवार गिराई. पौने तीन बजे ढांचे का दाहिना गुंबद जमीन पर गिरा, एक घंटा और गुजरा तो बायां गुंबद भी धराशायी. शाम 4 बजकर 40 मिनट पर बीच का गुंबद भी तोड़ दिया गया.  

कल्याण सिंह ने इस घटना के तुरंत बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया. कहा जाता है कि पीएम नरसिम्हा राव दिल्ली में इस दौरान पूजा पर बैठे थे.  

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वहीं कल्याण सिंह ने माना था कि उन्होंने ढांचे की सुरक्षा के लिए वादा तो किया था लेकिन एक और भी निर्देश दिया था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलेगी, नहीं चलेगी. क्या बाबरी मस्जिद टूटने का उन्हें कोई अफसोस था? इसके जवाब में उन्होंने दो टूक कहा था-  ढांचा नहीं बचा कोई गम नहीं इस बात का. और ढांचे के टूटने का न मुझे कोई खेद है, न पश्चाताप है और न ही प्रायश्चित. नो रिग्रेट, नो रिपेंटेंस, नो सॉरो, नो ग्रीफ.

इसी कड़ी में अटल जी का भी एक चर्चित भाषण जानना चाहिए. बात ढांचे के गिरने से एक दिन पहले की है. 5 दिसंबर को लखनऊ में कारसेवकों को संबोधित करते हुए वाजपेयी ने अपने ही अंदाज में कहा था, “वहां नुकीले पत्थर निकले हैं, उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो जमीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा.”


खैर…बाबरी मस्जिद टूटने के बाद देश में अभूतपूर्व उन्माद का दौर देखने को मिला. मुंबई, दिल्ली, भोपाल समेत कई शहरों में दंगे हुए, अयोध्या भी नफरत की आग में झुलसी. आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत दिग्गज नेता अरेस्ट किए गए. हिंसा में सैकड़ों मौतें हुईं. देश की हवा एकदम से भारी और बोझिल हो गई.

इस घटना के 10 दिन बाद ही विध्वंस जांच के लिए लिब्राहन कमीशन बनाया गया. इसे 3 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी, लेकिन कमीशन ने पूरे 17 साल लिए और 30 जून 2009 को तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को रिपोर्ट सौंपी. इसकी टिप्पणियों को पब्लिक डोमेन में नहीं लाया गया.  

जनवरी 1993 में केंद्र ने कानून बनाकर विवादित परिसर और आसपास की लगभग 67 एकड़ ज़मीन को अधिग्रहित कर लिया. हाईकोर्ट में मुकदमे की सुनवाई होने लगी.  

हाई कोर्ट ने मालिकाना हक तय करने के लिए 2003 में  पुरातत्व विभाग से बाबरी मस्जिद और राम चबूतरे के नीचे खुदाई करवाई. इसकी रिपोर्ट में कहा गया कि इसके नीचे 10वीं सदी के मंदिरों के सबूत मिले हैं.


आखिरकार 2010 में वो मौका आया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में पहला फैसला दिया. कोर्ट ने ये जमीन मामले के तीन पक्षकारों के बीच बांट दी. तीनों जजों ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर यह माना कि रामलला का जन्म वहां हुआ होगा जहां मस्जिद की बीच वाली गुंबद है. फैसले में यह जमीन रामलला विराजमान को दी गई.  

नजदीक की राम चबूतरा और सीता रसोई की जमीन निर्मोही अखाड़ा को दी गई. जबकि बाकी बची एक तिहाई जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी गई. लेकिन अदालत का ये फैसला तीनों ही पक्षकारों को नामंजूर था. मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी.  

 

 

जान लें कि अयोध्या में मूल विवादित जमीन मात्र 1480 स्क्वायर यार्ड की थी. ये वो जमीन थी जिस पर 6 दिसंबर 1992 से पहले बाबरी मस्जिद बनी थी. हिन्दुओं का मानना है कि यहीं भगवान राम पैदा हुए थे. अगर कुल विवादित जमीन की बात करें तो 2.77 एकड़ है. जिसमें पूरा परिसर शामिल है. वैसे इस विवाद का फैसला आने से पहले सरकार ने यहां कुल 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था.  

2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो राम मंदिर फिर सुर्खियों में आया. जितना प्रचंड बीजेपी का बहुमत था, उतनी ही प्रबल जनता की उम्मीदें. विपक्षी बीजेपी पर तंज कस रहे थे- मंदिर वहीं बनाएंगे, लेकिन तारीख नहीं बताएंगे.


2017 में मामले को कोर्ट के बाहर सुलझाने की कोशिश हुई. लेकिन प्रयास कामयाब नहीं हो सका. मई 2019 में नरेंद्र मोदी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने. इधर सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त 2019 से इस मामले की रोजाना सुनवाई शुरू कर दी.

5 नवंबर 2019 को वो समय आया हमारे लोकतंत्र ने इतनी शक्ति जमाकर ली थी कि वो इतिहास लिखने को तैयार था. अयोध्या का फाइनल फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संपूर्ण 2.77 एकड़ विवादित जमीन पर हक हिन्दुओं का है. अदालत ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए एक दूसरी अहम जगह पर 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया.  

5 अगस्त 2020 को वो पल आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना की पाबंदियों के बीच राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया और अब इसी 22 जनवरी को भव्य मंदिर में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा की जानी है.

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