श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी और कैकेयी का राजा दशरथ से दो वरदान मांगना


(राम आ रहे हैं…जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो रहे हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस).  इस श्रृंखला ‘रामचरित मानस’ में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका सातवां खंड…)


जब से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तबसे अयोध्या में नित्य नए मंगल हो रहे हैं और आनन्द के बधावे बज रहे हैं. चौदहों लोकरूपी बड़े भारी पर्वतों पर पुण्यरूपी मेघ सुखरूपी जल बरसा रहे हैं. ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्ति रूपी सुहावनी नदियां उमड़-उमड़कर अयोध्यारूपी समुद्र में आ मिलीं. नगर के स्त्री-पुरुष अच्छी जाति के मणियों के समूह हैं, जो सब प्रकार से पवित्र, अमूल्य और सुन्दर हैं. नगर का ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता. ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजी की कारीगरी बस इतनी ही है. सब नगर निवासी श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को देखकर सब प्रकार से सुखी हैं. सब माताएं और सखी-सहेलियां अपनी मनोरथ रूपी बेल को फली हुई देखकर आनन्दित हैं. श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनन्दित होते हैं. सबके हृदय में ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजी को मनाकर प्रार्थना करके कहते हैं कि राजा अपने जीते-जी श्रीरामचन्द्रजी को युवराज पद दे दें.

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एक समय रघुकुल के राजा दशरथजी अपने सारे समाजसहित राजसभा में विराजमान थे. महाराज समस्त पुण्यों की मूर्ति हैं, उन्हें श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर यश सुनकर अत्यन्त आनन्द हो रहा है. सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुख को रखते हुए प्रीति करते हैं. पृथ्वी, आकाश, पाताल तीनों भुवनों में और भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में दशरथजी के समान बड़भागी और कोई नहीं है. मंगलों के मूल श्रीरामचन्द्रजी जिनके पुत्र हैं, उनके लिए जो कुछ कहा जाय सब थोड़ा है. राजा ने स्वाभाविक ही हाथ में दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुंह देखकर मुकुट को सीधा किया. देखा कि कानों के पास बाल सफेद हो गए हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन्! श्रीरामचन्द्रजी को युवराज पद देकर अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों नहीं लेते. हृदय में यह विचार लाकर (युवराज पद देने का निश्चय कर) राजा दशरथजी ने शुभ दिन और सुन्दर समय पाकर, प्रेम से पुलकित शरीर हो आनन्दमग्न मन से उसे गुरु वसिष्ठजी को जा सुनाया. राजा ने कहा- हे मुनिराज ! सुनिए. श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकार से सब योग्य हो गए हैं. सेवक, मन्त्री, सब नगरनिवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं. सभी को श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं. उनके रूप में आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है. हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवार सहित आपके ही समान उनपर स्नेह करते हैं.


जो लोग गुरु के चरणों की रज को मस्तक पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्य को अपने वश में कर लेते हैं. इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसी ने नहीं किया. आपकी पवित्र चरण रज की पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया. अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है. हे नाथ! वह भी आप ही के अनुग्रह से पूरी होगी. राजा का सहज प्रेम देखकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा- नरेश! आज्ञा दीजिए. हे राजन्! आपका नाम और यश ही सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओं को देने वाला है. हे राजाओं के मुकुटमणि! आपके मन की अभिलाषा फल का अनुगमन करती है. अपने जी में गुरुजी को सब प्रकार से प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणी से बोले- हे नाथ! श्रीरामचन्द्र को युवराज कीजिए. कृपा करके कहिये तो तैयारी की जाय. मेरे जीते-जी यह आनन्द उत्सव हो जाए, जिससे सब लोग अपने नेत्रों का लाभ प्राप्त करें. प्रभु के प्रसाद से शिवजी ने सब कुछ निबाह दिया, केवल यही एक लालसा मन में रह गई है. इस लालसा के पूर्ण हो जाने पर फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो. दशरथजी के मंगल और आनन्द के मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मन में बहुत प्रसन्न हुए.


वसिष्ठजी ने कहा- हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जी की जलन नहीं जाती, वही स्वामी श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेम के अनुगामी हैं. हे राजन्! अब देर न कीजिये; शीघ्र सब सामान सजाइए. शुभ दिन और सुन्दर मंगल तभी है जब श्रीरामचन्द्रजी युवराज हो जाएं. राजा आनन्दित होकर महल में आए और उन्होंने सेवकों को तथा मन्त्री सुमन्त्र को बुलवाया. उन लोगों ने ‘जय-जीव’ कहकर सिर नवाए. तब राजा ने सुन्दर मंगलमय वचन (श्रीरामजी को युवराज-पद देने का प्रस्ताव) सुनाए और कहा- यदि पंचों को (आप सबको) यह मत अच्छा लगे, तो हृदय में हर्षित होकर आप लोग श्रीरामचन्द्र का राजतिलक कीजिए. इस प्रिय वाणी को सुनते ही मन्त्री ऐसे आनन्दित हुए मानो उनके मनोरथरूपी पौधे पर पानी पड़ गया हो. मन्त्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि हे जगतपति! आप करोड़ों वर्ष जिएं. आपने जगतभर का मंगल करने वाला भला काम सोचा है. हे नाथ! शीघ्रता कीजिए, देर न लगाइए. मन्त्रियों की सुन्दर वाणी सुनकर राजा को ऐसा आनन्द हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डाली का सहारा पा गई हो. राजा ने कहा- श्रीरामचन्द्र के राज्याभिषेक के लिए मुनिराज वसिष्ठजी की जो-जो आज्ञा हो, आप लोग वही सब तुरंत करें.

 

 

मुनिराज ने हर्षित होकर कोमल वाणी से कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थों का जल ले आओ. फिर उन्होंने औषधि, मूल, फूल, फल और पत्र आदि अनेकों मांगलिक वस्तुओं के नाम गिनकर बताए. चंवर, मृगचर्म, बहुत प्रकार के वस्त्र, असंख्य जातियों के ऊनी और रेशमी कपड़े, मणियां (रत्न) तथा और भी बहुत-सी मंगल वस्तुएं, जो जगत में राज्याभिषेक के योग्य होती हैं. मुनि ने वेदों में कहा हुआ सब विधान बताकर कहा- नगर में बहुत से मंडप सजाओ. फलों समेत आम, सुपारी और केले के वृक्ष नगर की गलियों में चारों ओर रोप दो. सुन्दर मणियों के मनोहर चौक पुरवाओ और बाजार को तुरंत सजाने के लिए कह दो. श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवता की पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणों की सब प्रकार से सेवा करो. ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ. मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी के वचनों को शिरोधार्य करके सब लोग अपने-अपने काम में लग गए. मुनीश्वर ने जिसको जिस काम के लिए आज्ञा दी, उसने वह काम इतनी शीघ्रता से कर डाला कि मानो पहले से ही कर रखा था. राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओं को पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी के लिए सब मंगलकार्य कर रहे हैं. श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की सुहावनी खबर सुनते ही अवधभर में बड़ी धूम से बधावे बजने लगे. श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के शरीर में भी शुभ शकुन सूचित हुए. उनके सुन्दर मंगल अंग फड़कने लगे.


पुलकित होकर वे दोनों प्रेमसहित एक-दूसरे से कहते हैं कि ये सब शकुन भरत के आने की सूचना देने वाले हैं. उनको मामा के घर गए बहुत दिन हो गए. बहुत ही अवसेर आ रही है. शकुनों से प्रिय भरत के मिलने का विश्वास होता है और भरत के समान जगत में हमें कौन प्यारा है! शकुन का बस, यही फल है, दूसरा नहीं. श्रीरामचन्द्रजी को अपने भाई भरत का दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुए का हृदय अंडों में रहता है. इसी समय यह परम मंगल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा. जैसे चन्द्रमा को बढ़ते देखकर समुद्र में लहरों का विलास सुशोभित होता है. सबसे पहले रनिवास में जाकर जिन्होंने ये वचन सुनाए, उन्होंने बहुत से आभूषण और वस्त्र पाए. रानियों का शरीर प्रेम से पुलकित हो उठा और मन प्रेम में मग्न हो गया. वे सब मंगलकलश सजाने लगीं. सुमित्राजी ने मणियों के बहुत प्रकार के अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे. आनन्द में मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौशल्याजी ने ब्राह्मणों को बुलाकर बहुत दान दिए. उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागों की पूजा की और फिर बलि भेंट देने को कहा और प्रार्थना की कि जिस प्रकार से श्रीरामचन्द्रजी का कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिए.

कोयल की सी मीठी वाणी वाली, चन्द्रमा के समान मुखवाली और हिरन के बच्चे के से नेत्रों वाली स्त्रियां मंगलगान करने लगीं. श्रीरामचन्द्रजी का राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री-पुरुष हृदय में हर्षित हो उठे और विधाता को अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मंगल-साज सजाने लगे. तब राजा ने वसिष्ठजी को बुलाया और शिक्षा देने के लिए श्रीरामचन्द्रजी के महल में भेजा. गुरु का आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजी ने दरवाजे पर आकर उनके चरणों में मस्तक नवाया. आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घर में लाए और षोडशोपचार से पूजा करके उनका सम्मान किया. फिर सीताजी सहित उनके चरण स्पर्श किए और कमल के समान दोनों हाथों को जोड़कर श्रीरामजी बोले- यद्यपि सेवक के घर स्वामी का पधारना मंगलों का मूल और अमंगलों का नाश करने वाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दास को ही कार्य के लिए बुला भेजते. ऐसी ही नीति है. परन्तु प्रभु ने प्रभुता छोड़कर जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया. हे गोसाईं! अब जो आज्ञा हो, मैं वही करूं. स्वामी की सेवा में ही सेवक का लाभ है. श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम में सने हुए वचनों को सुनकर मुनि वसिष्ठजी ने श्रीरघुनाथजी की प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें. आप सूर्यवंश के भूषण जो हैं.


श्रीरामचन्द्रजी के गुण, शील और स्वभाव का बखान कर, मुनिराज प्रेम से पुलकित होकर बोले- हे रामचन्द्रजी! राजा दशरथजी ने राज्याभिषेक की तैयारी की है. वे आपको युवराज पद देना चाहते हैं. इसलिए हे रामजी! आज आप उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक सब संयम कीजिए, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस काम को निभा दें. गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजी के पास चले गए. श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में यह सुनकर इस बात का खेद हुआ कि हम सब भाई एक ही साथ जन्मे;  खाना, सोना, लड़कपन के खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए, पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही (मेरा ही) होता है. उसी समय प्रेम और आनन्द में मग्न लक्ष्मणजी आए. रघुकुलरूपी कुमुद के खिलाने वाले चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया. बहुत प्रकार के बाजे बज रहे हैं. नगर के अतिशय आनन्द का वर्णन नहीं हो सकता. सब लोग भरतजी का आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और राज्याभिषेक का उत्सव देखकर नेत्रों का फल प्राप्त करें. बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरों पर (जहां-तहां) पुरुष और स्त्री आपस में यही कहते हैं कि कल वह शुभ लग्न कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे.


जब सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्ण के सिंहासन पर विराजेंगे और हमारा मन चीता होगा. इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं. उन्हें देवताओं को अवध के बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोर को चांदनी रात नहीं भाती. सरस्वतीजी को बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरों को पकड़कर उनपर गिरते हैं. वे कहते हैं- हे माता! हमारी बड़ी विपत्ति को देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वन को चले जाएं और देवताओं का सब कार्य सिद्ध हो.  देवताओं की विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि हाय! मैं कमलवन के लिए हेमन्त ऋतु की रात हुई. उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे- हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा. श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्ष से रहित हैं. आप तो श्रीरामजी के सब प्रभाव को जानती ही हैं. जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुख का भागी होता है. अतएव देवताओं के हित के लिए आप अयोध्या जाइए. बार-बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया. तब वह यह विचारकर चलीं कि देवताओं की बुद्धि ओछी है. इनका निवास तो ऊंचा है, पर इनकी करनी नीची है. ये दूसरे का ऐश्वर्य नहीं देख सकते. परंतु आगे के काम का विचार करके (श्रीरामजी के वन जाने से राक्षसों का वध होगा, जिससे सारा जगत सुखी हो जाएगा) सरस्वती हृदय में हर्षित होकर दशरथजी की अयोध्या में आईं, मानो दुख देने वाली कोई ग्रहदशा आई हो.

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मंथरा नाम की कैकेयी की एक मन्दबुद्धि दासी थी, उसे अपयश की पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धि को फेरकर चली गईं. मंथरा ने देखा कि नगर सजाया हुआ है. सुंदर मंगलमय बधावे बज रहे हैं. उसने लोगों से पूछा कि कैसा उत्सव है? श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक की बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा. वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकार से यह काम रात-ही-रात में बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहद का छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरह से उखाड़ लूं. वह उदास होकर भरतजी की माता कैकेयी के पास गईं. रानी कैकेयी ने हंसकर कहा- तू उदास क्यों है? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी सांस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आंसू ढरका रही है. रानी हंसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं (तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलने वाली है). मेरा मन कहता है कि लक्ष्मण ने तुझे कुछ दंड दिया है. तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती. ऐसी लंबी सांस छोड़ रही है, मानो काली नागिन फुफकार छोड़ रही हो. तब रानी ने डरकर कहा- अरी! कहती क्यों नहीं? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशल से तो हैं? यह सुनकर कुबरी मन्थरा के हृदय में बड़ी ही पीड़ा हुई. वह कहने लगी- हे माई! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूंगी (बढ़-बढ़कर बोलूंगी). रामचन्द्र को छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज-पद दे रहे हैं.


आज कौशल्या को विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं. तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मन में क्षोभ हुआ है. तुम्हारा पुत्र परदेश में है, तुम्हें कुछ सोच नहीं. जानती हो कि स्वामी हमारे वश में है. तुम्हें तो तोशक-पलंग पर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजा की कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं. मन्थरा के प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मन की मैली जानकर रानी डांटकर बोली- बस, अब चुप रह घर फोड़ी कहीं की! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूंगी. कानों, लंगड़ों और कुबड़ों को कुटिल और कुचाली जानना चाहिए. उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजी की माता कैकेयी मुसकरा दीं और फिर बोलीं- हे प्रिय वचन कहने वाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है. मुझे तुझपर स्वप्न में भी क्रोध नहीं है. सुन्दर मंगलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा. बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है. यह सूर्यवंश की सुहावनी रीति ही है. यदि सचमुच कल ही श्रीराम का तिलक है, तो हे सखी! तेरे मन को अच्छी लगे वही वस्तु मांग ले, मैं दूंगी.

अस्थिर बुद्धि की स्त्री और देवताओं की माया के वश में होने के कारण रहस्ययुक्त कपट भरे प्रिय वचनों को सुनकर रानी कैकेयी ने बैरिन मन्थरा को अपनी सुहृद जानकर उसका विश्वास कर लिया. बार-बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गई हो. जैसी भावी है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गई. दासी अपना दांव लगा जानकर हर्षित हुई. तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूं. क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है. बहुत तरह से गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्या की साढ़साती बोली- हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और राम को तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है. परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गए. समय फिर जाने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं. सूर्य कमल के कुल का पालन करने वाला है, पर बिना जल के वही सूर्य उनको (कमलों को) जलाकर भस्म कर देता है. सौत कौशल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है. अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ लगाकर उसे रूंध दो. तुमको अपने सुहाग के झूठे बलपर कुछ भी सोच नहीं है; राजा को अपने वश में जानती हो. किन्तु राजा मन के मैले और मुंह के मीठे हैं! और आपका सीधा स्वभाव है. राम की माता (कौशल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है. उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली. राजा ने जो भरत को ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस राम की माता की ही सलाह समझिये!

कौशल्या समझती है कि और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरत की मां पति के बलपर गर्वित रहती है! इसी से हे माई! कौशल्या को तुम बहुत ही खटक रही हो. किन्तु वह कपट करने में चतुर है; अतः उसके हृदय का भाव जानने में नहीं आता. राजा का तुमपर विशेष प्रेम है. कौशल्या सौत के स्वभाव से उसे देख नहीं सकती. इसीलिए उसने जाल रचकर राजा को अपने वश में करके (भरत की अनुपस्थिति में) राम के राजतिलक के लिए लग्न निश्चय करा लिया. राम को तिलक हो, यह कुल (रघुकुल) के उचित ही है और यह बात सभी को सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है. परन्तु मुझे तो आगे की बात विचारकर डर लगता है. देव उलटकर इसका फल उसी (कौशल्या) को दे. इस तरह करोड़ों कुटिलपन की बातें गढ़-छोलकर मन्थरा ने कैकेयी को उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतों की कहानियां इस प्रकार कहीं जिस प्रकार विरोध बढ़े. होनहारवश कैकेयी के मन में विश्वास हो गया. रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी. मन्थरा बोली- क्या पूछती हो? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा? अपने भले-बुरे को तो पशु भी पहचान लेते हैं. पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पाई है आज मुझसे! मैं तुम्हारे राज में खाती-पहनती हूं, इसलिए सच कहने में मुझे कोई दोष नहीं है.


यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊंगी तो विधाता मुझे दंड देगा. यदि कल राम का राजतिलक हो गया तो समझ रखना कि तुम्हारे लिए विधाता ने विपत्ति का बीज बो दिया. मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूं, हे भामिनी! तुम तो अब दूध की मक्खी हो गई! जो पुत्रसहित कौशल्या की चाकरी बजाओगी तो घर में रह सकोगी; कद्रू ने विनता को दुख दिया था, तुम्हें कौशल्या देगी. भरत कारागार का सेवन करेंगे और लक्ष्मण राम के नायब होंगे. कैकेयी मन्थरा की कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गई, कुछ बोल नहीं सकती. शरीर में पसीना हो आया और वह केले की तरह कांपने लगी. तब मन्थरा ने अपनी जीभ दांतों तले दबाई. फिर कपट की करोड़ों कहानियां कह कहकर उसने रानी को खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयी का भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी. वह बगुली को हंसिनी मानकर उसकी सराहना करने लगी. कैकेयी ने कहा- मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है. मेरी दाहिनी आंख नित्य फड़का करती है. मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूं; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं. सखी! क्या करूं, मेरा तो सीधा स्वभाव है. मैं दायां-बायां कुछ भी नहीं जानती. अपनी चलते मैंने आजतक कभी किसी का बुरा नहीं किया. फिर न जाने किस पाप से देव ने मुझे एक ही साथ यह दुख दिया.

मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूंगी; पर जीते-जी सौत की चाकरी नहीं करूंगी. देव जिसको शत्रु के वश में रखकर जिलाता है, उसके लिए तो जीने की अपेक्षा मरना ही अच्छा है. रानी ने बहुत प्रकार के दीन वचन कहे. उन्हें सुनकर कुबरी ने त्रियाचरित्र फैलाया. वह बोली- तुम मन में ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा, जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाम में यह बुराईरूप फल पाएगी. हे स्वामिनि! मैंने जब से यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिन में कुछ भूख लगती है और न रात में नींद ही आती है. मैंने ज्योतिषियों से पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है. हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊं. राजा तुम्हारी सेवा के वश में हैं ही. कैकेयी ने कहा- मैं तेरे कहने से कुएं में गिर सकती हूं, पुत्र और पति को भी छोड़ सकती हूं. जब तू मेरा बड़ा भारी दुख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हित के लिए उसे क्यों न करूंगी?

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दासी कहती है- हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं? तुम्हारे दो वरदान राजा के पास धरोहर हैं. आज उन्हें राजा से मांगकर अपनी छाती ठंडी करो. पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और सौत का सारा आनन्द तुम ले लो. जब राजा राम की सौगंध खा लें, तब वर मांगना, जिससे वचन न टलने पावे. आज की रात बीत गई, तो काम बिगड़ जाएगा. मेरी बात को हृदय से प्रिय समझना. पापिनी मन्थरा ने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा- कोपभवन में जाओ. सब काम बड़ी सावधानी से बनाना, राजा पर सहसा विश्वास न कर लेना. कुबरी को रानी ने प्राणों के समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धि का बखान किया और बोली- संसार में मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है. तू मुझ बही जाती हुई के लिए सहारा हुई है. यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आंखों की पुतली बना लूं. इस प्रकार दासी को बहुत तरह से आदर देकर कैकेयी कोपभवन में चली गई. विपत्ति बीज है, दासी वर्षा ऋतु है, कैकेयी की कुबुद्धि उस बीज के बोने के लिए जमीन हो गई. उसमें कपटरूपी जल पाकर अंकुर फूट निकला. दोनों वरदान उस अंकुर के दो पत्ते हैं और अन्त में इसके दुखरूपी फल होगा.


कैकेयी कोप का सब साज सजकर कोपभवन में जा सोई. राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धि से नष्ट हो गई. राजमहल और नगर में धूम-धाम मच रही है. इस कुचाल को कोई कुछ नहीं जानता. बड़े ही आनन्दित होकर नगर के सब स्त्री-पुरुष शुभ मंगलाचार के साज सज रहे हैं. कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वार में बड़ी भीड़ हो रही है. श्रीरामचन्द्रजी के बालसखा राजतिलक का समाचार सुनकर हृदय में हर्षित होते हैं. वे दस-पांच मिलकर श्रीरामचन्द्रजी के पास जाते हैं. प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणी से कुशल-क्षेम पूछते हैं. अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर वे आपस में एक-दूसरे से श्रीरामचन्द्रजी की बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं- संसार में श्रीरघुनाथजी के समान शील और स्नेह को निभाने वाला कौन है? भगवान हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनि में जन्में, वहां-वहां हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्त तक निभ जाए. नगर में सबकी ऐसी ही अभिलाषा है. परन्तु कैकेयी के हृदय में बड़ी जलन हो रही है. कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता. नीच के मत के अनुसार चलने से चतुराई नहीं रह जाती. सन्ध्या के समय राजा दशरथ आनन्द के साथ कैकेयी के महल में गए. मानो साक्षात स्नेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरता के पास गया हो!

कोपभवन का नाम सुनकर राजा सहम गए. डर के मारे उनका पांव आगे को नहीं पड़ता. स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओं के बलपर बसता है और सम्पूर्ण राजा लोग जिनका रुख देखते रहते हैं, वही राजा दशरथ स्त्री का क्रोध सुनकर सूख गए. कामदेव का प्रताप और महिमा तो देखिए. जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदि की चोट अपने अंगों पर सहने वाले हैं, वे रतिनाथ कामदेव के पुष्पबाण से मारे गए. राजा डरते-डरते अपनी प्यारी कैकेयी के पास गए. उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुख हुआ. कैकेयी जमीन पर पड़ी हैं. पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए हैं. शरीर के नाना आभूषणों को उतारकर फेंक दिया है. उस दुर्बुद्धि कैकेयी को यह कुवेषता (बुरा वेष) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापन की सूचना दे रही हो. राजा उसके पास जाकर कोमल वाणी से बोले- ‘हे रानी! किसलिए रूठी हो?’ यह कहकर राजा उसे हाथ से स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथ को झटककर हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोध में भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टि से देख रही हो. दोनों वरदानों की वासनाएं उस नागिन की दो जीभें हैं और दोनों वरदान दांत हैं; वह काटने के लिए मर्मस्थान देख रही है.  राजा दशरथ होनहार के वश में होकर इसे कामदेव की क्रीड़ा ही समझ रहे हैं. राजा बार-बार कह रहे हैं- हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोध का कारण तो सुना.

हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज किसको लेना चाहते हैं? कह, किस कंगाल को राजा कर दूं या किस राजा को देश से निकाल दूं. तेरा शत्रु अमर देवता भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूं. बेचारे कीड़े-मकोड़े-सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं. हे सुन्दरी! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमा का चकोर है. हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व सम्पत्ति, पुत्र, यहां तक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वश में हैं. यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊं तो हे भामिनी! मुझे सौ बार राम की सौगंध है. तू हंसकर अपनी मनचाही बात मांग ले और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से सजा. मौका-बेमौका तो मन में विचारकर देख. हे प्रिये ! जल्दी इस बुरे वेष को त्याग दे. यह सुनकर और मन में रामजी की बड़ी सौगन्ध को विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हंसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृग को देखकर फंदा तैयार कर रही हो! अपने जी में कैकेयी को सुहृद जानकर राजा दशरथजी प्रेम से पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणी से फिर बोले- हे भामिनि ! तेरा मन चीता हो गया. नगर में घर-घर आनन्द के बधावे बज रहे हैं.


मैं कल ही राम को युवराज पद दे रहा हूं. इसलिए हे सुनयनी! तू मंगल-साज सज. यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा. मानो पका हुआ बालतोड़ छू गया हो. ऐसी भारी पीड़ा को भी उसने हंसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती. राजा उसकी कपट-चतुराई को नहीं लख रहे हैं. क्योंकि वह करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि गुरु मन्थरा की पढ़ायी हुई है. यद्यपि राजा नीति में निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है. फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर नेत्र और मुंह मोड़कर हंसती हुई बोली- हे प्रियतम! आप मांग-मांग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं. आपने दो वरदान देने को कहा था, उनके भी मिलने में सन्देह है. राजा ने हंसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म समझा. मान करना तुम्हें परम प्रिय है. तुमने उन वरों को थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी मांगा ही नहीं और मेरा भूलने का स्वभाव होने से मुझे भी वह प्रसंग याद नहीं रहा. मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो. चाहे दो के बदले चार मांग लो. रघुकुल में सदा से यही रीति चली आई है कि प्राण भले ही चले जाएं, पर वचन नहीं जाता. असत्य के समान पापों का समूह भी नहीं है. क्या करोड़ों घुंघचियां मिलकर भी कहीं पहाड़ के समान हो सकती हैं. ‘सत्य’ ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों) की जड़ है. यह बात वेद-पुराणों में प्रसिद्ध है और मनुजी ने भी यही कहा है. उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजी की शपथ करने में आ गई. श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेह की सीमा हैं.

इस प्रकार बात पक्की कराके दुर्बुद्धि कैकेयी हंसकर बोली- हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मन को भानेवाला एक वर तो दीजिए, भरत को राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर मांगती हूं, मेरा मनोरथ पूरा कीजिए. तपस्वियों के वेष में विशेष उदासीन भाव से राम चौदह वर्ष तक वन में निवास करें. कैकेयी के वचन सुनकर राजा के हृदय में ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से चकवा विकल हो जाता है. राजा सहम गए, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वन में बटेर पर झपटा हो. राजा का रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़ के पेड़ को बिजली ने मारा हो. माथे पर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात सोच ही शरीर धारण कर सोच कर रहा हो. वे सोचते हैं- हाय! मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयी ने हथिनी की तरह उसे जड़ समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला. कैकेयी ने अयोध्या को उजाड़ कर दिया और विपत्ति की अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी.

 

 

किस अवसर पर क्या हो गया! स्त्री का विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योग की सिद्धिरूपी फल मिलने के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है. इस प्रकार राजा मन-ही-मन झींख रहे हैं. राजा का ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मन में बुरी तरह से क्रोधित हुई. और बोली- क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाए हैं? जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिए- हां कीजिए, नहीं तो ना हीं कर दीजिए. आप रघुवंश में सत्य प्रतिज्ञा वाले हैं! आपने ही वर देने को कहा था, अब भले ही न दीजिए. सत्य को छोड़ दीजिये और जगत में अपयश लीजिए. सत्य की बड़ी सराहना करके वर देने को कहा था. समझा था कि यह चबेना ही मांग लेगी! राजा शिबि, दधीचि और बलि ने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचन की प्रतिज्ञा को निभाया. कैकेयी बहुत ही कड़वे वचन कह रही है, मानो जले पर नमक छिड़क रही हो. धर्म की धुरी को धारण करने वाले राजा दशरथ ने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी सांस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा. प्रचंड क्रोध से जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखाई पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यान से बाहर) खड़ी हो. कुबुद्धि उस तलवार की मूठ है, निष्ठुरता धार है और वह कुबरी (मंथरा) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है.

राजा ने देखा कि यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है और सोचा- क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रता के साथ  कैकेयी को प्रिय लगने वाली वाणी बोले- हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेम को नष्ट करके ऐसे बुरी तरह के वचन कैसे कह रही हो. मेरे तो भरत और रामचंद्र दो आंखें हैं; यह मैं शंकरजी की साक्षी देकर सत्य कहता हूं. दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जाएंगे. अच्छा दिन शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरत को राज्य दे दूंगा. राम को राज्य का लोभ नहीं है और भरत पर उनका बड़ा ही प्रेम है. मैं ही अपने मन में बड़े-छोटे का विचार करके राजनीति का पालन कर रहा था. राम की सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभाव से ही कहता हूं कि राम की माता (कौशल्या) ने इस विषय में मुझसे कभी कुछ नहीं कहा. अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया. इसी से मेरा मनोरथ खाली गया. अब क्रोध छोड़ दे और मंगल साज सज. कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जाएंगे. एक ही बात का मुझे दुख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चन का मांगा.


उसकी आंच से अब भी मेरा हृदय जल रहा है. यह दिल्लगी में, क्रोध में अथवा सचमुच ही सच्चा है? क्रोध को त्यागकर राम का अपराध तो बता. सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं. तू स्वयं भी राम की सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी. अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे? जिसका स्वभाव शत्रु को भी अनुकूल है, वह माता के प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा? हे प्रिये! क्रोध छोड़ दे और विवेक विचारकर वर मांग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरत का राज्याभिषेक देख सकूं. मछली चाहे बिना पानी के जीती रहे और सांप भी चाहे बिना मणि के दीन-दुखी होकर जीता रहे. परन्तु मैं स्वभाव से ही कहता हूं, मन में जरा भी छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन राम के बिना नहीं है. हे चतुर प्रिये! जी में समझ देख, मेरा जीवन श्रीराम के दर्शन के अधीन है. राजा के कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है. मानो अग्नि में घी की आहुतियां पड़ रही हों. कैकेयी कहती है- आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहां आपकी माया नहीं लगेगी. या तो मैंने जो मांगा है सो दीजिये, नहीं तो ‘ना’ करके अपयश लीजिए. मुझे बहुत प्रपंच नहीं सुहाते. राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और राम की माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है. कौशल्या ने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके उन्हें वैसा ही फल दूंगी.

सबेरा होते ही मुनि का वेष धारणकर यदि राम वन को नहीं जाते, तो हे राजन्! मन में समझ लीजिए कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश! ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोध की नदी उमड़ी हो. वह नदी पापरूपी पहाड़ से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जल से भरी है. दोनों वरदान उस नदी के दो किनारे हैं, कैकेयी का कठिन हठ ही उसकी तीव्र धारा है और कुबरी (मंथरा) के वचनों की प्रेरणा ही भंवर है. राजा ने समझ लिया कि बात सचमुच सच्ची है, स्त्री के बहाने मेरी मृत्यु ही सिर पर नाच रही है. तदंतर राजा ने कैकेयी के चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल के लिए कुल्हाड़ी मत बन. तू मेरा मस्तक मांग ले, मैं तुझे अभी दे दूं. पर राम के विरह में मुझे मत मार. जिस किसी प्रकार से हो तू राम को रख ले. नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी. राजा ने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणी से ‘हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!’ कहते हुए सिर पीटकर जमीन पर गिर पड़े. राजा व्याकुल हो गए. उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनी ने कल्पवृक्ष को उखाड़ फेंका हो. कंठ सूख गया, मुख से बात नहीं निकलती, मानो पानी के बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो.


कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घाव में जहर भर रही हो. कहती है- जो अंत में ऐसा ही करना था, तो आपने ‘मांग, मांग’ किस बल पर कहा था? हे राजा! ठहाका मारकर हंसना और गाल फुलाना- क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना. क्या रजपूती में क्षेम-कुशल भी रह सकती है? या तो वचन ही छोड़ दीजिए या धैर्य धारण कीजिए. यों असहाय स्त्री की भांति रोइये-पीटिये नहीं. सत्यव्रती के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी सब तिनके के बराबर कहे गए हैं. कैकेयी के मर्मभेदी वचन सुनकर राजा ने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है. मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है. भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते. होनहारवश तेरे ही जी में कुमति आ बसी. यह सब मेरे पापों का परिणाम है, जिससे कुसमय में विधाता विपरीत हो गया. तेरी उजाड़ी हुई यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभांति बसेगी और समस्त गुणों के धाम श्रीराम की प्रभुता भी होगी. सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में श्रीराम की बड़ाई होगी. केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरने पर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जाएगा. अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर. मुंह छिपाकर मेरी आंखों की ओट जा बैठ.

मैं हाथ जोड़कर कहता हूं कि जबतक मैं जीता रहूं, तब तक फिर कुछ न कहना. अरी अभागिनी! फिर तू अंत में पछताएगी जो तू नहारू के लिए गाय को मार रही है. राजा करोड़ों प्रकार से (बहुत तरह से) समझाकर और यह कहकर कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वी पर गिर पड़े. पर कपट करने में चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो मौन होकर मसान जगा रही हो. राजा ‘राम-राम’ रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंख के बिना बेहाल हो. वे अपने हृदय में मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजी से यह बात न कहे. हे रघुकुल के गुरु सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें. अयोध्या को बेहाल देखकर आपके हृदय में बड़ी पीड़ा होगी. राजा की प्रीति और कैकेयी की निष्ठुरता दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है. विलाप करते-करते ही राजा को सबेरा हो गया. राजद्वार पर वीणा, बांसुरी और शंख की ध्वनि होने लगी. भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणों का गान कर रहे हैं. सुनने पर राजा को वे बाण-जैसे लगते हैं. राजा को ये सब मंगल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पति के साथ सती होने वाली स्त्री को आभूषण! श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण उस रात्रि में किसी को भी नींद नहीं आयी.

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